देश में लड़कियों की सुरक्षा और स्कूटर की बिक्री के बीच क्या संबंध है? आप चौंक गए होंगे। लेकिन इनके बीच संबंध है। लड़कियों की सुरक्षा को लेकर राजधानी दिल्ली और अन्य शहरों में जैसे-जैसे गंभीर सवाल उठ रहें हैं, देश में स्कूटरों की बिक्री भी उतनी ही तेजी से बढ़ने लगी है। मां-बाप सार्वजनिक वाहन में बेटियों और बहुओं को भेजने के बजाय स्कूटर से भेजना पंसद कर रहे हैं। यही वजह है कि चालू वित्त वर्ष के दौरान अभी तक मोटरसाइकिलों की बिक्री में लगभग तीन फीसद की बिक्री दर्ज की गई है, जबकि स्कूटरों की बिक्री 23 फीसद की रफ्तार से बढ़ी है। आज होंडा, हीरो, टीवीएस, सुजुकी को छोड़ दीजिए, सिर्फ दमदार व तेज रफ्तार मोटरसाइकिल बनाने वाली कंपनी यामाहा भी इस बाजार में उतर गई है। ऑटो एक्सपो-2014 में कम से कम दर्जन भर नए स्कूटर पेश किए गए हैं। स्कूटर बाजार में मुख्य मुकाबला हीरो और इसकी पूर्व सहयोगी होंडा के बीच ही है। हीरो ने स्कूटरों की तीन नई रेंज उतारने का फैसला किया है। इन्हें अगले दो वषरें के भीतर भारतीय ग्राहकों के समक्ष बिक्री के लिए रखा जाएगा। इसकी प्रमुख प्रतिद्वंद्वी कंपनी होंडा भी कम नहीं है। भारतीय स्कूटर बाजार को नया जीवन देने वाली कंपनी होंडा अगले दो वषरें के भीतर तीन नए स्कूटी रेंज पेश करेगी। इनमें नई तरह की कई खास बातें होंगी, जो महिलाओं को ही ध्यान में रखकर तैयार की गई हैं। यामाहा और टीवीएस की भी योजना ठोस तरीके से इस बाजार में आगे बढ़ने की है।
चलो तुम्हें पार्क में ले जाएं
आजकल के दौर में बहुत से बच्चे टीवी, कंप्यूटर व इनडोर गेम्स में इतने मस्त रहते है कि न तो वे बाहर खेलने जाना चाहते है और न ही उनके माता-पिता के पास इतना समय होता है कि वे उन्हे बाहर घुमाने ले जाएं।
बाल मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि यह स्थिति बच्चों के मानसिक व शारीरिक विकास के लिए ठीक नहीं है। इसलिए माता-पिता को चाहिए कि वे बच्चों को पार्क इत्यादि घुमाने अवश्य ले जाएं। बस कुछ बातों का ध्यान रखें।
- पार्क ले जाते समय बच्चों को मौसम के अनुकूल वस्त्र पहनाकर ले जाएं। पार्क ले जाने के दौरान बहुत महंगे कपड़े न पहनाएं अन्यथा आपको और बच्चों को हर वक्त धूल-मिट्टी से कपड़े खराब होने का डर बना रहेगा और बच्चा खुलकर खेल भी नहीं पाएगा।
- आप चाहें तो बच्चों के साथ परिवार के अन्य लोगों और पड़ोसी के बच्चों को भी ले जा सकती है। वह लोगों के साथ तालमेल बिठाना सीखेगा। इससे आपके बच्चे का मानसिक और सामाजिक विकास सही ढंग से होगा।
- जब भी बच्चे को पार्क ले जाएं, अपने साथ कुछ इंडोर गेम्स जैसे लूडो, छोटा सा कैरम बोर्ड, अन्य प्रकार के गेम्स और बैडमिंटन, फुटबाल आदि अवश्य ले जाएं।
- बच्चे के साथ स्वयं भी खेलें। इससे उसको यह महसूस होगा कि आप उसकी कितनी फिक्र करती हैं।
- पार्क जाते समय पानी की बोतल व खाने का कुछ सामान अपने साथ अवश्य ले जाएं। कई बार खेलते-खेलते बच्चों को भूख लग आती है। खाने का सामान साथ होने पर बच्चे को बाहर की खुली चीजें खरीदकर देने की जरूरत नहीं पड़ेगी। इससे उसका स्वास्थ्य भी सही रहेगा।
- झूला झूलते समय बच्चे के पास रहे और उस पर बराबर नजर रखें कि कहीं कोई दुर्घटना न हो जाए।
- पति की छुट्टी हो तो उन्हे भी साथ चलने को कहे। इससे बच्चों को आपके साथ समय बिताने में और मजा आएगा। साथ ही पति को भी कुछ बदलाव महसूस होगा।
- पार्क में अगर कर्मचारी है तो उनसे बच्चों की जान-पहचान अवश्य करवा देनी चाहिए, ताकि जरूरत पड़ने पर वे आपकी मदद कर सकें।
- बच्चों को घर से ही समझाकर ले जाएं कि पार्क में फूल-पली न तोड़े और न ही खाने-पीने की चीजें इधर-उधर फेंकें।
इला शर्मा
एडमिशन से पहले परखें स्कूल
क्या आप अपने बच्चे का स्कूल में एडमीशन कराना चाहती हैं? यदि हां तो कुछ बातों को ध्यान में रखना अति आवश्यक है। सबसे पहले तो आप बच्चे की उम्र को लेकर अपना मन पक्का कर लें, क्योंकि आजकल दो से ढाई साल तक के बच्चों के प्री-स्कूल, प्री-टॉडलर्स बहुतायत में खुलने लगे हैं और कामकाजी माता-पिता के लिए ये बहुत उपयोगी भी साबित होते हैं। कई जगह तो 'क्रेच' (पालना घर) ही छोटे बच्चों के स्कूल बन गए हैं और 'डे बोर्रि्डग' स्कूल भी अब इन सब कमियों को अच्छे से पूरा करने में लग गए हैं।
-सबसे पहले बच्चे की उम्र वाले उपयोगी और निर्धारित स्कूलों का ही चयन करें।
-स्कूल की दूरी सर्वाधिक महत्वपूर्ण होती है।
-फिर आती है समस्या आने-जाने की। पैदल, रिक्शा, वैन, बस या आप स्वयं रोजाना बच्चे के साथ जा सकती हैं। कई जगह दादा-दादी या नाना-नानी भी यह भूमिका निभाते पाए जाते हैं।
-बच्चों को आपने 'टॉयलेट-ट्रेनिंग' (बाथरूम जाने की) दी है या नहीं। कई जगह यह जरूर पूछा जाता है।
-स्कूल का चुनाव अपने बजट के अनुरूप करें और अपनी आर्थिक स्थिति के अनुसार ही स्कूल का बजट बनाएं वरना बाद में आप परेशानी हो सकती हैं।
-स्कूल के क्लास रूम का वातावरण देखें।
-स्कूल की स्वास्थ्य सुविधाएं अवश्य देखें। वायु, रोशनी, धूप का समुचित प्रबंध स्कूल में होना अनिवार्य है।
-कक्षा में बच्चे अधिक न हों वरना टीचर्स प्रत्येक बच्चे पर व्यक्तिगत रूप से ध्यान नहीं दे पाएंगे।
-खेलने की सुविधाएं मसलन सुरक्षित झूले, खेल का मैदान आदि जरूर हों।
-इंडोर एवं आउटडोर गेम्स का समुचित प्रबंध हो।
-आकर्षक और शिक्षाप्रद खिलौने हों।
-स्वीमिंग पूल सुरक्षित हो और शिक्षित ट्रेनर अवश्य हो।
-स्कूल में सुरक्षा के समुचित उपाय हों।
-पुस्तकालय (लाइब्रेरी), कम्प्यूटर आदि की उचित व्यवस्था हो।
-स्कूल का भवन कैसा है, ज्यादा सीढ़ी वाला, छोटा सा है, गली में है, ये सब बातें ध्यान में जरूर रखें।
-होम वर्क कैसे और कितना देते हैं? स्कूल में ही कराते हैं या अभिभावकों के ही जिम्मे होता है। ये सब जानकारी भी अवश्य करें।
-नियमित पैरेंट्स-टीचर्स मीटिंग होना भी स्कूल का एक महत्वपूर्ण पक्ष है। अभिभावकों और अध्यापकों में संवाद कायम होना बच्चे और स्कूल दोनों के लिए फायदेमंद होता है।
-बच्चे को स्कूल भेजने से पहले घर में उसे शिष्टाचार, मैनर्स (तौर-तरीके) आदि भी जरूर सिखाती रहें। कई जगह तो सामान्य ज्ञान की अच्छी खासी परीक्षा ली जाती है, इस पर भी नजर रखें।
-कई विद्यालयों में तो मम्मी-पापा का भी 'इंटरव्यू' होने लगा है। आप इससे भयभीत न हों। अपने ऊपर विश्वास रखें, प्रश्नों के उत्तर सहजता और सरलता से दें, जो बातें आपको नहीं मालूम उसके लिए सॉरी बोलकर यह कह सकती हैं कि जल्दी ही आप सीख लेंगी।
-आजकल बहुत से स्कूलों में बच्चों का हेल्थ रिकार्ड भी रखा जाता है। इसके लिए बच्चे के वैक्सीनेशन कार्ड और हेल्थ फाइल की फोटो कॉपी अवश्य जमा करवा दें।
खूबसूरत चट्टानों की मिसाल है भेड़ाघाट
खूबसूरत चट्टानों की मिसाल है भेड़ाघाट
वैविध्यपूर्ण प्राकृतिक देन की वजह से मध्यप्रदेश पूरी दुनिया में मशहूर है। यहां की झीलें, पर्वत, नदियां, प्राचीन किले और हरा-भरा शांत वातावरण हमेशा ही सैलानियों को यहां आने के लिए आकर्षित करता रहता है। प्रकृति की एक मनोहारी स्वप्न भूमि
'भेड़ाघाट' ऐसा ही एक आकर्षक पर्यटन स्थल है जो अपनी ऊंची-ऊंची चट्टानों और झीलों के लिए जाना जाता है। भेड़ाघाट का वातावरण बेहद शांत रहता है। कहा जाता है कि एक बार राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने 'जब इस जगह का दौरा किया तब उन्होंने कहा था कि जितनी शांति यहां है, वैसी अगर दुनिया में हो जाए तो क्या कहना!!'
संगमरमर चट्टानों की मनोहारी छंटा
भेड़ाघाट की खासियत नर्मदा नदी के दोनों तटों पर संगमरमर की सौ फुट तक ऊंची चट्टानें हैं। संगमरमर के लगभग दो किलोमीटर लंबे चट्टानों के आकार की अनूठी विविधा और विभिन्न मनोहारी रंगों की कोमल छटा देखते ही बनती है। सूरज की रोशनी इन सफेद और मटमैले रंग के संगमरमर चट्टानों पर पड़ती है, तो नदी में बनने वाला इसका प्रतिबिंब अद्भुत होता है। इसके अलावा भेड़ाघाट और यहां के संगमरमर चट्टान की खूबसूतरी उस समय चरम पर होती है जब चांद की रोशनी चट्टान और नदी पर एक साथ पड़ती है। इन संगमरमरी चट्टानों पर तेज प्रवाह से गिरता नर्मदा नदी का जल पर्यटकों को हमेशा ही आकर्षित करता है।
आजादी से पहले भारतीय यात्री कैप्टन जे. फोरसाइथ ने अपनी पुस्तक 'हाइलैंड्स ऑफ सेंट्रल इंडिया' में मध्य भारत की आकृतियों और प्राकृतिक सुंदरता के बारे में बहुत कुछ लिखा है। तब वह भेड़ाघाट की खूबसूरत चट्टानों की व्याख्या करने से खुद को रोक नहीं पाते थे।
'धुआंधार' जल प्रपात
यहां से कुछ ही दूरी पर 'धुआंधार' नामक प्रसिद्ध जल प्रपात भी है। यहां पवित्र नदी नर्मदा कुछ फीट नीचे खड्ड में गिरती है और फुहारों के साथ ऊपर उछलती है। यह नजारा विश्व में बहुत ही कम जगह देखने को मिलता है।
अगर आप भेड़ाघाट जाते हैं तो वहां बोटिंग का भी अनुभव ले सकते हैं। सैलानियों के लिए धूप में छल-छल चमकते पानी पर बोटिंग करना एक सुखद अनुभूति होती है। हर साल सैलानी नवंबर से मई के बीच यहां पहुंचकर मात्र 20 रुपए में रोमांचकारी बोटिंग का लुत्फ उठाते हैं।
कैसे पहुंचें
भेड़ाघाट के लिए नजदीकी एयरपोर्ट जबलपुर (23 किलोमीटर) है। दिल्ली और भोपाल आदि से जबलपुर के लिए नियमित रूप से फ्लाइट उड़ान भरती है। एयरपोर्ट के अलावा जबलपुर एक बहुत बड़ा रेलवे जंक्शन भी है। यहां से आप बस, टैंपो, टैक्सी आदि लेकर भेड़ाघाट आसानी से पहुंच सकते हैं।
पुरानी जीन्स और गिटार
सरकारी आदेश के तहत तार को जब मौत के घाट उतारा गया तो तार का मातम मनाने वालों ने इसे भी समारोह बना डाला।
तार क्रांति ऐतिहासिक थी। तार आया तो प्रिंट मीडिया में खबर की रफ्तार बढ़ गई। सब अंग्रेजों की माया। उनका कब्जा। उनका सब्जा!
अपने शासन को मजबूत करने के लिए तार लाया गया। अगर तार न होता तो अंग्रेज अठारह सौ सत्तावन की क्रांति को न रोक पाते। इतिहास बताता है कि जब दिल्ली में क्रांतिकारियों का राज कायम हो गया तब लाल किले के पीछे-पीछे जाने वाले तारों के जरिए कलकत्ते तक एक अंग्रेज तार बाबू ने ही खबर पहुंचाई कि दिल्ली हाथ से निकल गई है, तुरत फौज भेजिए!
क्रांतिकारी सिपाहियों को यह पता नहीं था कि तार के जरिए भी अंग्रेज अपनी फौज मंगा कर विद्रोह को कुचल सकते हैं। यही हुआ। सिपाहियों को तोपों के मुंह पर बांध कर उड़ाया गया। दिल्ली पर अंग्रेज काबिज हो गए। इतिहास फिर फिरंगी के हवाले हो गया।
इतिहास की यह पलट तार ने की। उसकी तकनीक ने की। रेललाइन के साथ-साथ जाने वाले तार देश भर में फैल गए। भारत पर एकछत्र शासन लाने में तारघरों ने बड़ी मदद की।
तब तक भारतीय लोगों ने तार के जादू को समझ लिया था। एओ ह्यूम ने कांग्रेस की स्थापना के लिए तार के संदेशों का उपयोग किया था। आजादी की लड़ाई में तार का भरपूर उपयोग होने लगा। इस तरह जो तकनीक 1857 में दमन के लिए इस्तेमाल हुई वही आजादी की लड़ाई के लिए कारगर होने लगी। ‘भारत छोड़ो’ के दौरान आजादी के लिए लड़ने वालों ने कई जगह तार के खंभे इसीलिए उखाड़ दिए ताकि अंग्रेज इकट््ठे होकर दमन न कर सकें। संचार में बयालीस तक बहुत कुछ बदल गया था!
उसके बाद तार जनता के लिए दुख-सुख का तुरंत समाचार देने वाला माध्यम बन गया। उसका ज्यादा इस्तेमाल ज्यादातर फौज में, व्यापार में, राजनीति में और पत्रकारिता में होने लगा। जनता के बीच वह नौकरी की या शोक की खबर देने वाला माना जाने लगा। तार माध्यम से आगे बढ़ कर ‘संदेश’ बन गया। आते ही सबको सांप सूंघ जाता। सिपाहियों के मरने की खबर तार से आती। सर्वत्र शोक व्याप्त कर देती। तार से भावनात्मक संबंध ठहर गया। टेलीप्रिंटर आया और अखबारों को रिपोर्ताज मिलने लगे। खबरें ज्यादा ताजा होने लगीं।
सब चलता रहता अगर बेतार क्रांति और आगे वाली उपग्रह क्रांति न हुई होती, उससे जुड़ी ताबड़तोड़ टीवी, मोबाइल और इंटरनेट क्रांति एक के बाद एक न हुई होती।
और जैसा कि होता है, तकनीकी जिस गति से पिछले पचास साल में बदली है, उतनी तेजी से कुछ नहीं बदला। जितनी तेजी से तकनीकी बदली, उतनी ही तेजी से समाज का ढांचा, समाज का संचार और व्यवहार बदला।
टीवी आया तो पहली गाज सिनेमाघरों पर गिरी, नाटकोंपर गिरी। उसने इन दो विधाओं को आत्मसात कर लिया। किताब पर गिरी, उसे भी आत्मसात कर लिया। दुनिया देखते-देखते ग्लोबल विलेज बन गई।
इसके आगे के काम इंटरनेट और मोबाइल ने पूरे किए। सबको तुरता समय में सबसे जोड़ दिया। कनेक्टिविटी इतनी तेज और चपल हो गई कि काल का बंधन टूट गया।
संचार की नई तकनीकों के लगातार बदलाव का सबसे ज्यादा असर डाक और तार पर ही पड़ा। इंटरनेट ने, मोबाइल संदेशों ने चिट््ठी-पत्री बेकार कर दी। उदारीकरण ने डाकिए की जगह कूरियर को दे दी। मनीआॅर्डर की जगह टेली-मनीआॅर्डर ने ले ली। अब तो डाइरेक्ट कैश ट्रांसफर योजना ने इन सबको पीछे छोड़ दिया।
जिस दिन मोबाइल आया उसी दिन तारघर की सीमा समझ में आ गई थी। मोबाइल ने लोगों के बीच संवाद को इतना सरल कर दिया कि तारघर जाने की जगह एक एसएमएस ही काफी रहने लगा। तार कम होने लगे, मोबाइल बढ़ने लगे। मोबाइल के आगे तार सर्वत्र हारा, यहां भी हारा।
मोबाइल ने रील वाले कैमरे तक को बंद कर दिया। डिजिटल क्रांति ने मोबाइल रील वाले पुराने ढंग के मोबाइल कैमरे तक को बेकार कर दिया। अब हर आदमी कैमरामैन है, हर आदमी संपादक है, हर आदमी खरिया है कमाल है।
जिस पीढ़ी के हाथों मेंमोबाइल है- जिसमें कैमरा है, इंटरनेट है, रेडियो है- उसी ने तार के विदा होने पर सबसे ज्यादा नाटकीय दृश्य पैदा किए।
जिस दिन तार बंद किया गया उस दिन का नजारा मजेदार रहा। जिस युवा पीढ़ी के लोग कभी तारघर तक नहीं गए, सैकड़ों की संख्या में तारघर पहुंचे और चार रुपए के एक शब्द के रेट से राष्ट्रपति, राहुल गांधी और मनमोहन जी को तार दिए। कुछ ने तारघरों के आगे खडेÞ होकर अपने-अपने मोबाइल से एक दूसरे के फोटो खींचे। इस तरह से वे तार के ‘इतिहास’ में शामिल हुए।
फुकुयामा के ‘इतिहास का अंत’ की सिद्धांतिकी का मर्म इस घटना से समझा जा सकता है। जरा देखें: जिस मोबाइल ने तार की विदाई सुनिश्चित की, वह युवा पीढ़ी का जबर्दस्त संचार माध्यम है। मोबाइल क्रांति ने तार को पहले ही बेकार कर दिया था। जो मोबाइल पीढ़ी तार के लिए शोक मनाने आई वह मोबाइल सहित आई। वह चाहती तो न आती लेकिन तार के जाते हुए क्षण की वह गवाह होना चाहती थी। तार उसके लिए अजनबी था।
तार क्रांति ऐतिहासिक थी। तार आया तो प्रिंट मीडिया में खबर की रफ्तार बढ़ गई। सब अंग्रेजों की माया। उनका कब्जा। उनका सब्जा!
अपने शासन को मजबूत करने के लिए तार लाया गया। अगर तार न होता तो अंग्रेज अठारह सौ सत्तावन की क्रांति को न रोक पाते। इतिहास बताता है कि जब दिल्ली में क्रांतिकारियों का राज कायम हो गया तब लाल किले के पीछे-पीछे जाने वाले तारों के जरिए कलकत्ते तक एक अंग्रेज तार बाबू ने ही खबर पहुंचाई कि दिल्ली हाथ से निकल गई है, तुरत फौज भेजिए!
क्रांतिकारी सिपाहियों को यह पता नहीं था कि तार के जरिए भी अंग्रेज अपनी फौज मंगा कर विद्रोह को कुचल सकते हैं। यही हुआ। सिपाहियों को तोपों के मुंह पर बांध कर उड़ाया गया। दिल्ली पर अंग्रेज काबिज हो गए। इतिहास फिर फिरंगी के हवाले हो गया।
इतिहास की यह पलट तार ने की। उसकी तकनीक ने की। रेललाइन के साथ-साथ जाने वाले तार देश भर में फैल गए। भारत पर एकछत्र शासन लाने में तारघरों ने बड़ी मदद की।
तब तक भारतीय लोगों ने तार के जादू को समझ लिया था। एओ ह्यूम ने कांग्रेस की स्थापना के लिए तार के संदेशों का उपयोग किया था। आजादी की लड़ाई में तार का भरपूर उपयोग होने लगा। इस तरह जो तकनीक 1857 में दमन के लिए इस्तेमाल हुई वही आजादी की लड़ाई के लिए कारगर होने लगी। ‘भारत छोड़ो’ के दौरान आजादी के लिए लड़ने वालों ने कई जगह तार के खंभे इसीलिए उखाड़ दिए ताकि अंग्रेज इकट््ठे होकर दमन न कर सकें। संचार में बयालीस तक बहुत कुछ बदल गया था!
उसके बाद तार जनता के लिए दुख-सुख का तुरंत समाचार देने वाला माध्यम बन गया। उसका ज्यादा इस्तेमाल ज्यादातर फौज में, व्यापार में, राजनीति में और पत्रकारिता में होने लगा। जनता के बीच वह नौकरी की या शोक की खबर देने वाला माना जाने लगा। तार माध्यम से आगे बढ़ कर ‘संदेश’ बन गया। आते ही सबको सांप सूंघ जाता। सिपाहियों के मरने की खबर तार से आती। सर्वत्र शोक व्याप्त कर देती। तार से भावनात्मक संबंध ठहर गया। टेलीप्रिंटर आया और अखबारों को रिपोर्ताज मिलने लगे। खबरें ज्यादा ताजा होने लगीं।
सब चलता रहता अगर बेतार क्रांति और आगे वाली उपग्रह क्रांति न हुई होती, उससे जुड़ी ताबड़तोड़ टीवी, मोबाइल और इंटरनेट क्रांति एक के बाद एक न हुई होती।
और जैसा कि होता है, तकनीकी जिस गति से पिछले पचास साल में बदली है, उतनी तेजी से कुछ नहीं बदला। जितनी तेजी से तकनीकी बदली, उतनी ही तेजी से समाज का ढांचा, समाज का संचार और व्यवहार बदला।
टीवी आया तो पहली गाज सिनेमाघरों पर गिरी, नाटकोंपर गिरी। उसने इन दो विधाओं को आत्मसात कर लिया। किताब पर गिरी, उसे भी आत्मसात कर लिया। दुनिया देखते-देखते ग्लोबल विलेज बन गई।
इसके आगे के काम इंटरनेट और मोबाइल ने पूरे किए। सबको तुरता समय में सबसे जोड़ दिया। कनेक्टिविटी इतनी तेज और चपल हो गई कि काल का बंधन टूट गया।
संचार की नई तकनीकों के लगातार बदलाव का सबसे ज्यादा असर डाक और तार पर ही पड़ा। इंटरनेट ने, मोबाइल संदेशों ने चिट््ठी-पत्री बेकार कर दी। उदारीकरण ने डाकिए की जगह कूरियर को दे दी। मनीआॅर्डर की जगह टेली-मनीआॅर्डर ने ले ली। अब तो डाइरेक्ट कैश ट्रांसफर योजना ने इन सबको पीछे छोड़ दिया।
जिस दिन मोबाइल आया उसी दिन तारघर की सीमा समझ में आ गई थी। मोबाइल ने लोगों के बीच संवाद को इतना सरल कर दिया कि तारघर जाने की जगह एक एसएमएस ही काफी रहने लगा। तार कम होने लगे, मोबाइल बढ़ने लगे। मोबाइल के आगे तार सर्वत्र हारा, यहां भी हारा।
मोबाइल ने रील वाले कैमरे तक को बंद कर दिया। डिजिटल क्रांति ने मोबाइल रील वाले पुराने ढंग के मोबाइल कैमरे तक को बेकार कर दिया। अब हर आदमी कैमरामैन है, हर आदमी संपादक है, हर आदमी खरिया है कमाल है।
जिस पीढ़ी के हाथों मेंमोबाइल है- जिसमें कैमरा है, इंटरनेट है, रेडियो है- उसी ने तार के विदा होने पर सबसे ज्यादा नाटकीय दृश्य पैदा किए।
जिस दिन तार बंद किया गया उस दिन का नजारा मजेदार रहा। जिस युवा पीढ़ी के लोग कभी तारघर तक नहीं गए, सैकड़ों की संख्या में तारघर पहुंचे और चार रुपए के एक शब्द के रेट से राष्ट्रपति, राहुल गांधी और मनमोहन जी को तार दिए। कुछ ने तारघरों के आगे खडेÞ होकर अपने-अपने मोबाइल से एक दूसरे के फोटो खींचे। इस तरह से वे तार के ‘इतिहास’ में शामिल हुए।
फुकुयामा के ‘इतिहास का अंत’ की सिद्धांतिकी का मर्म इस घटना से समझा जा सकता है। जरा देखें: जिस मोबाइल ने तार की विदाई सुनिश्चित की, वह युवा पीढ़ी का जबर्दस्त संचार माध्यम है। मोबाइल क्रांति ने तार को पहले ही बेकार कर दिया था। जो मोबाइल पीढ़ी तार के लिए शोक मनाने आई वह मोबाइल सहित आई। वह चाहती तो न आती लेकिन तार के जाते हुए क्षण की वह गवाह होना चाहती थी। तार उसके लिए अजनबी था।
इसीलिए वह हाजिर रहना चाहती थी। मोबाइल ने उसे मारा यह जानते हुए भी वह तार को आखिरी बार देखने आई। यह दुख-रहित नाटकीय शोक था, यह सहानुभति-रहित गवाही थी कि वह मरा और उसे हमने मरते हुए देखा। फेसबुक पर, ट्विटर पर आती ओपीनियनें सुपरिचित वाग्विलास की तरह रहीं। कमतर शब्दों, उक्ति वैचित्र्य के उदाहरण रहीं।
उसकी चारों तरफ की दुनिया उसके लिए मोबाइल में, इंटरनेट में है। उसका सकल ज्ञान उसके विकीपीडिया में है। उसकी दुनिया उसके दिमाग में न होकर उसके यंत्र में है। दिमाग का भी वह न्यूनतम और इकहरा उपयोग करता है। प्रसन्न होकर तार को विदाई देना-फोटो खिंचवाना इतिहास बनाना है।
तात्कालिकता इतनी आवेगमय है कि हर क्षण दर्शनशास्त्र में बाद में पुराना पड़ता है, इस पीढ़ी के लिए पहले व्यतीत हो जाता है। वह उस व्यतीत को अपने में व्यापा नहीं मानती। वह उससे अलग कहीं और बीता हुआ होता है। यह उसकी ‘टाइमिंग’ है।
इस तात्कालिकता में पुराने के प्रति, अतीत के प्रति, व्यतीत के प्रति ‘लगावट’ नहीं है। वह ‘तुरंता’ (इस्टेंट) है। ठहराव रहित वह ‘दिग्भ्रम’ में रहता है। उसकी मानसिकता का पक्का नक्शा किसी के पास नहीं है। उसके मन की अवस्था पर कोई नोट नहीं लिखा गया। न कविता में न कहानी में। न उपन्यास में। उसके अंतर्मन में नहीं जाया गया। वे हर घर में, हर कहीं हैं, आबादी के पचपन फीसद बताए जाते हैं। राजनेता, विविध दल उनको अपनी ओर आकर्षित करने में लगे हैं। वे फेसबुक पर हैं, वे ट्विटर पर हैं, वे तुरंता उत्तेजक ओपीनियनों में हैं। वे परस्पर कटाक्षों में हैं, वे एक दूसरे को नीचा दिखाने वाले कमेंटों में हैं।
यह इस लेखक की मोबाइल मरीचिका में मगन युवाओं के अलबेले और अनजान मन को छूने की कोशिश भर है। यह उसके राग-विराग को, उसके अतीत-व्यतीत को, उसके वर्तमान को टटोलने की कोशिश भर है। कि जैसे आप उससे दो मिनट बात कर लिए हों। इसका मतलब यह नहीं है कि यह पीढ़ी अनुत्पादक है या अरचनात्मक है या कल्पना-रहित है या भविष्य-रहित है या असामाजिक है। वह हर हाल में ‘भिन्न सामाजिक’ है। उसका ‘भिन्न सामाजिक’ होना उसे एक ही साथ हमसे दूर करता है और अनिवार्य भी बनाता है।
उसकी लगावट देखनी हो तो तार की विदाई के साथ-साथ आ रहे उस बडेÞ विज्ञापन को भी देखा जा सकता है जिसमें अतीत से, पुराने से उसकी लगावट का एक नया अध्याय रचा जाता दिखता है।
यह एक कार कंपनी और एक अंग्रेजी अखबार का विज्ञापन है, जो कार की तरह और अखबार की तरह ही तुरंता तात्कालिक है। कार खरीदी जाते ही कीमत गिराती जाती है और नित नए मॉडलों में हर क्षण पुरानी होती जाती है; अखबार शाम तक रद्दी हो जाता है। कार-कबाड़ देखने के लिए आप दिल्ली की मध्यवर्गीय सोसाइटियों पर नजर दौड़ाइए तो मालूम हो जाएगा कि वहां कारें आदमियों से कहीं ज्यादा हैं। चार रुपए के अखबार की रद््दी दस रुपए किलो में बिकती है।
हम विज्ञापन पर लौटें: पुरानी चीजों का एक बहुत ऊंचा-सा बड़ा-सा ढेर एक जगह बना है जिसमें घर में काम आने वाली तमाम पुरानी चीजें फेंकी गई हैं; एक-दो लोग उसको लिए जा रह हैं फेंकने। अंधेरा है। तभी पार्श्व में एक कोरस गूंजने लगता है: तू तू करने में क्या है मजा/ अब हम ही मैं और मैं ही हम! गाना बजता है, उधर एक युवती एक मशाल लेकर उस पुराने ढेर में आग लगा देती है। लिखा आता है: आइ विल बी चेंज! यह संदेश देने वाली है एक कार कंपनी, एक अंग्रेजी अखबार!
पुरानी चीजों के साथ इस विज्ञापन में जो संबंध बन रहा है उसी तरह का संबंध एक अन्य विज्ञापन में बनाया जाता है कि जिसमें एक आॅनलाइन कंपनी को दिखा कर संदेश दिया जाता है। पुरानी कार हो गई बेच दे, पुरानी गिटार हो गई बेच दे। संदेश है: यहां सब कुछ बिकता है।
पुराने का जलना, हम ही मैं और मैं ही हम या उधर सब कुछ बिकता है कहना कानों में अनेकार्थ वाची हो उठता है।
यह है संदेशों के इशारों से मन का मैनेजमेंट!
यह पुरानी जीन्स और गिटार वाले गाने से आगे की बात है। बिकने में ‘विराग’ कुछ इस तरह पैदा हो रहा है कि पुरानी जीन्स और गिटार अतीत-राग, नॉस्टेल्जिया नहीं देते, कूड़े के ढेर में तजा दिए जाते हैं!
पुराने के पुनरुपयोग की जगह उसे बाहर फेंक देना, जला देना एक क्रूर क्रिया है। तारघर के सामने खड़े होकर फोटो खिंचवाना ऐसी ही क्रिया है।
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