अमर सिंह और जयाप्रदा ने कांग्रेस में जाने की अटकलों को विराम देकर सोमवार को राष्ट्रीय लोकदल (रालोद) का दामन थाम लिया है। पश्चिम उत्तर प्रदेश में मजबूत मानी जाने वाली रालोद अमर सिंह की मदद से पूर्वाचल में अपनी जड़ मजबूत करने के प्रयास में रहेगी। रामपुर से सांसद जयप्रदा व अमर सिंह को रालोद लोकसभा चुनाव में उतारने को तैयार है। हाल में कांग्रेस में जाने को लेकर चर्चा मे रहीं जयाप्रदा ने रालोद का दामन थाम लिया है। आज अमर सिंह के साथ ही वह रालोद में शामिल हो गई। जयाप्रदा के रूप में जहां रालोद को एक चेहरा मिल गया है, वहीं अमर सिंह के आने से रालोद की पूरब में कमजोर पड़ी पकड़ मजबूत होने की संभावना बढ गई है, क्योंकि समाजवादी पार्टी (सपा) में रहते हुए व लोकमंच के बैनर तले अमर सिंह ने पूरब में ही अपनी पूरी सियासी कसरत केंद्रित रखी थी। साथ ही, अजित सिंह जहां हरित प्रदेश के समर्थक हैं, वहीं अमर सिंह पूर्वाचल के। ऐसे में फिर छोटे राज्यों के मुद्दे को हवा मिलनी तय है। गौरतलब है कि कांग्रेस के साथ तालमेल कर लोकसभा चुनाव लड़ रही रालोद में अमर सिंह ने भी अपनी पार्टी राष्ट्रीय लोकमंच का विलय भी कर लिया है।
'बेटी' की हुई चिंता तो बिकने लगे स्कूटर
देश में लड़कियों की सुरक्षा और स्कूटर की बिक्री के बीच क्या संबंध है? आप चौंक गए होंगे। लेकिन इनके बीच संबंध है। लड़कियों की सुरक्षा को लेकर राजधानी दिल्ली और अन्य शहरों में जैसे-जैसे गंभीर सवाल उठ रहें हैं, देश में स्कूटरों की बिक्री भी उतनी ही तेजी से बढ़ने लगी है। मां-बाप सार्वजनिक वाहन में बेटियों और बहुओं को भेजने के बजाय स्कूटर से भेजना पंसद कर रहे हैं। यही वजह है कि चालू वित्त वर्ष के दौरान अभी तक मोटरसाइकिलों की बिक्री में लगभग तीन फीसद की बिक्री दर्ज की गई है, जबकि स्कूटरों की बिक्री 23 फीसद की रफ्तार से बढ़ी है। आज होंडा, हीरो, टीवीएस, सुजुकी को छोड़ दीजिए, सिर्फ दमदार व तेज रफ्तार मोटरसाइकिल बनाने वाली कंपनी यामाहा भी इस बाजार में उतर गई है। ऑटो एक्सपो-2014 में कम से कम दर्जन भर नए स्कूटर पेश किए गए हैं। स्कूटर बाजार में मुख्य मुकाबला हीरो और इसकी पूर्व सहयोगी होंडा के बीच ही है। हीरो ने स्कूटरों की तीन नई रेंज उतारने का फैसला किया है। इन्हें अगले दो वषरें के भीतर भारतीय ग्राहकों के समक्ष बिक्री के लिए रखा जाएगा। इसकी प्रमुख प्रतिद्वंद्वी कंपनी होंडा भी कम नहीं है। भारतीय स्कूटर बाजार को नया जीवन देने वाली कंपनी होंडा अगले दो वषरें के भीतर तीन नए स्कूटी रेंज पेश करेगी। इनमें नई तरह की कई खास बातें होंगी, जो महिलाओं को ही ध्यान में रखकर तैयार की गई हैं। यामाहा और टीवीएस की भी योजना ठोस तरीके से इस बाजार में आगे बढ़ने की है।
चलो तुम्हें पार्क में ले जाएं
आजकल के दौर में बहुत से बच्चे टीवी, कंप्यूटर व इनडोर गेम्स में इतने मस्त रहते है कि न तो वे बाहर खेलने जाना चाहते है और न ही उनके माता-पिता के पास इतना समय होता है कि वे उन्हे बाहर घुमाने ले जाएं।
बाल मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि यह स्थिति बच्चों के मानसिक व शारीरिक विकास के लिए ठीक नहीं है। इसलिए माता-पिता को चाहिए कि वे बच्चों को पार्क इत्यादि घुमाने अवश्य ले जाएं। बस कुछ बातों का ध्यान रखें।
- पार्क ले जाते समय बच्चों को मौसम के अनुकूल वस्त्र पहनाकर ले जाएं। पार्क ले जाने के दौरान बहुत महंगे कपड़े न पहनाएं अन्यथा आपको और बच्चों को हर वक्त धूल-मिट्टी से कपड़े खराब होने का डर बना रहेगा और बच्चा खुलकर खेल भी नहीं पाएगा।
- आप चाहें तो बच्चों के साथ परिवार के अन्य लोगों और पड़ोसी के बच्चों को भी ले जा सकती है। वह लोगों के साथ तालमेल बिठाना सीखेगा। इससे आपके बच्चे का मानसिक और सामाजिक विकास सही ढंग से होगा।
- जब भी बच्चे को पार्क ले जाएं, अपने साथ कुछ इंडोर गेम्स जैसे लूडो, छोटा सा कैरम बोर्ड, अन्य प्रकार के गेम्स और बैडमिंटन, फुटबाल आदि अवश्य ले जाएं।
- बच्चे के साथ स्वयं भी खेलें। इससे उसको यह महसूस होगा कि आप उसकी कितनी फिक्र करती हैं।
- पार्क जाते समय पानी की बोतल व खाने का कुछ सामान अपने साथ अवश्य ले जाएं। कई बार खेलते-खेलते बच्चों को भूख लग आती है। खाने का सामान साथ होने पर बच्चे को बाहर की खुली चीजें खरीदकर देने की जरूरत नहीं पड़ेगी। इससे उसका स्वास्थ्य भी सही रहेगा।
- झूला झूलते समय बच्चे के पास रहे और उस पर बराबर नजर रखें कि कहीं कोई दुर्घटना न हो जाए।
- पति की छुट्टी हो तो उन्हे भी साथ चलने को कहे। इससे बच्चों को आपके साथ समय बिताने में और मजा आएगा। साथ ही पति को भी कुछ बदलाव महसूस होगा।
- पार्क में अगर कर्मचारी है तो उनसे बच्चों की जान-पहचान अवश्य करवा देनी चाहिए, ताकि जरूरत पड़ने पर वे आपकी मदद कर सकें।
- बच्चों को घर से ही समझाकर ले जाएं कि पार्क में फूल-पली न तोड़े और न ही खाने-पीने की चीजें इधर-उधर फेंकें।
इला शर्मा
एडमिशन से पहले परखें स्कूल
क्या आप अपने बच्चे का स्कूल में एडमीशन कराना चाहती हैं? यदि हां तो कुछ बातों को ध्यान में रखना अति आवश्यक है। सबसे पहले तो आप बच्चे की उम्र को लेकर अपना मन पक्का कर लें, क्योंकि आजकल दो से ढाई साल तक के बच्चों के प्री-स्कूल, प्री-टॉडलर्स बहुतायत में खुलने लगे हैं और कामकाजी माता-पिता के लिए ये बहुत उपयोगी भी साबित होते हैं। कई जगह तो 'क्रेच' (पालना घर) ही छोटे बच्चों के स्कूल बन गए हैं और 'डे बोर्रि्डग' स्कूल भी अब इन सब कमियों को अच्छे से पूरा करने में लग गए हैं।
-सबसे पहले बच्चे की उम्र वाले उपयोगी और निर्धारित स्कूलों का ही चयन करें।
-स्कूल की दूरी सर्वाधिक महत्वपूर्ण होती है।
-फिर आती है समस्या आने-जाने की। पैदल, रिक्शा, वैन, बस या आप स्वयं रोजाना बच्चे के साथ जा सकती हैं। कई जगह दादा-दादी या नाना-नानी भी यह भूमिका निभाते पाए जाते हैं।
-बच्चों को आपने 'टॉयलेट-ट्रेनिंग' (बाथरूम जाने की) दी है या नहीं। कई जगह यह जरूर पूछा जाता है।
-स्कूल का चुनाव अपने बजट के अनुरूप करें और अपनी आर्थिक स्थिति के अनुसार ही स्कूल का बजट बनाएं वरना बाद में आप परेशानी हो सकती हैं।
-स्कूल के क्लास रूम का वातावरण देखें।
-स्कूल की स्वास्थ्य सुविधाएं अवश्य देखें। वायु, रोशनी, धूप का समुचित प्रबंध स्कूल में होना अनिवार्य है।
-कक्षा में बच्चे अधिक न हों वरना टीचर्स प्रत्येक बच्चे पर व्यक्तिगत रूप से ध्यान नहीं दे पाएंगे।
-खेलने की सुविधाएं मसलन सुरक्षित झूले, खेल का मैदान आदि जरूर हों।
-इंडोर एवं आउटडोर गेम्स का समुचित प्रबंध हो।
-आकर्षक और शिक्षाप्रद खिलौने हों।
-स्वीमिंग पूल सुरक्षित हो और शिक्षित ट्रेनर अवश्य हो।
-स्कूल में सुरक्षा के समुचित उपाय हों।
-पुस्तकालय (लाइब्रेरी), कम्प्यूटर आदि की उचित व्यवस्था हो।
-स्कूल का भवन कैसा है, ज्यादा सीढ़ी वाला, छोटा सा है, गली में है, ये सब बातें ध्यान में जरूर रखें।
-होम वर्क कैसे और कितना देते हैं? स्कूल में ही कराते हैं या अभिभावकों के ही जिम्मे होता है। ये सब जानकारी भी अवश्य करें।
-नियमित पैरेंट्स-टीचर्स मीटिंग होना भी स्कूल का एक महत्वपूर्ण पक्ष है। अभिभावकों और अध्यापकों में संवाद कायम होना बच्चे और स्कूल दोनों के लिए फायदेमंद होता है।
-बच्चे को स्कूल भेजने से पहले घर में उसे शिष्टाचार, मैनर्स (तौर-तरीके) आदि भी जरूर सिखाती रहें। कई जगह तो सामान्य ज्ञान की अच्छी खासी परीक्षा ली जाती है, इस पर भी नजर रखें।
-कई विद्यालयों में तो मम्मी-पापा का भी 'इंटरव्यू' होने लगा है। आप इससे भयभीत न हों। अपने ऊपर विश्वास रखें, प्रश्नों के उत्तर सहजता और सरलता से दें, जो बातें आपको नहीं मालूम उसके लिए सॉरी बोलकर यह कह सकती हैं कि जल्दी ही आप सीख लेंगी।
-आजकल बहुत से स्कूलों में बच्चों का हेल्थ रिकार्ड भी रखा जाता है। इसके लिए बच्चे के वैक्सीनेशन कार्ड और हेल्थ फाइल की फोटो कॉपी अवश्य जमा करवा दें।
खूबसूरत चट्टानों की मिसाल है भेड़ाघाट
खूबसूरत चट्टानों की मिसाल है भेड़ाघाट
वैविध्यपूर्ण प्राकृतिक देन की वजह से मध्यप्रदेश पूरी दुनिया में मशहूर है। यहां की झीलें, पर्वत, नदियां, प्राचीन किले और हरा-भरा शांत वातावरण हमेशा ही सैलानियों को यहां आने के लिए आकर्षित करता रहता है। प्रकृति की एक मनोहारी स्वप्न भूमि
'भेड़ाघाट' ऐसा ही एक आकर्षक पर्यटन स्थल है जो अपनी ऊंची-ऊंची चट्टानों और झीलों के लिए जाना जाता है। भेड़ाघाट का वातावरण बेहद शांत रहता है। कहा जाता है कि एक बार राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने 'जब इस जगह का दौरा किया तब उन्होंने कहा था कि जितनी शांति यहां है, वैसी अगर दुनिया में हो जाए तो क्या कहना!!'
संगमरमर चट्टानों की मनोहारी छंटा
भेड़ाघाट की खासियत नर्मदा नदी के दोनों तटों पर संगमरमर की सौ फुट तक ऊंची चट्टानें हैं। संगमरमर के लगभग दो किलोमीटर लंबे चट्टानों के आकार की अनूठी विविधा और विभिन्न मनोहारी रंगों की कोमल छटा देखते ही बनती है। सूरज की रोशनी इन सफेद और मटमैले रंग के संगमरमर चट्टानों पर पड़ती है, तो नदी में बनने वाला इसका प्रतिबिंब अद्भुत होता है। इसके अलावा भेड़ाघाट और यहां के संगमरमर चट्टान की खूबसूतरी उस समय चरम पर होती है जब चांद की रोशनी चट्टान और नदी पर एक साथ पड़ती है। इन संगमरमरी चट्टानों पर तेज प्रवाह से गिरता नर्मदा नदी का जल पर्यटकों को हमेशा ही आकर्षित करता है।
आजादी से पहले भारतीय यात्री कैप्टन जे. फोरसाइथ ने अपनी पुस्तक 'हाइलैंड्स ऑफ सेंट्रल इंडिया' में मध्य भारत की आकृतियों और प्राकृतिक सुंदरता के बारे में बहुत कुछ लिखा है। तब वह भेड़ाघाट की खूबसूरत चट्टानों की व्याख्या करने से खुद को रोक नहीं पाते थे।
'धुआंधार' जल प्रपात
यहां से कुछ ही दूरी पर 'धुआंधार' नामक प्रसिद्ध जल प्रपात भी है। यहां पवित्र नदी नर्मदा कुछ फीट नीचे खड्ड में गिरती है और फुहारों के साथ ऊपर उछलती है। यह नजारा विश्व में बहुत ही कम जगह देखने को मिलता है।
अगर आप भेड़ाघाट जाते हैं तो वहां बोटिंग का भी अनुभव ले सकते हैं। सैलानियों के लिए धूप में छल-छल चमकते पानी पर बोटिंग करना एक सुखद अनुभूति होती है। हर साल सैलानी नवंबर से मई के बीच यहां पहुंचकर मात्र 20 रुपए में रोमांचकारी बोटिंग का लुत्फ उठाते हैं।
कैसे पहुंचें
भेड़ाघाट के लिए नजदीकी एयरपोर्ट जबलपुर (23 किलोमीटर) है। दिल्ली और भोपाल आदि से जबलपुर के लिए नियमित रूप से फ्लाइट उड़ान भरती है। एयरपोर्ट के अलावा जबलपुर एक बहुत बड़ा रेलवे जंक्शन भी है। यहां से आप बस, टैंपो, टैक्सी आदि लेकर भेड़ाघाट आसानी से पहुंच सकते हैं।
पुरानी जीन्स और गिटार
सरकारी आदेश के तहत तार को जब मौत के घाट उतारा गया तो तार का मातम मनाने वालों ने इसे भी समारोह बना डाला।
तार क्रांति ऐतिहासिक थी। तार आया तो प्रिंट मीडिया में खबर की रफ्तार बढ़ गई। सब अंग्रेजों की माया। उनका कब्जा। उनका सब्जा!
अपने शासन को मजबूत करने के लिए तार लाया गया। अगर तार न होता तो अंग्रेज अठारह सौ सत्तावन की क्रांति को न रोक पाते। इतिहास बताता है कि जब दिल्ली में क्रांतिकारियों का राज कायम हो गया तब लाल किले के पीछे-पीछे जाने वाले तारों के जरिए कलकत्ते तक एक अंग्रेज तार बाबू ने ही खबर पहुंचाई कि दिल्ली हाथ से निकल गई है, तुरत फौज भेजिए!
क्रांतिकारी सिपाहियों को यह पता नहीं था कि तार के जरिए भी अंग्रेज अपनी फौज मंगा कर विद्रोह को कुचल सकते हैं। यही हुआ। सिपाहियों को तोपों के मुंह पर बांध कर उड़ाया गया। दिल्ली पर अंग्रेज काबिज हो गए। इतिहास फिर फिरंगी के हवाले हो गया।
इतिहास की यह पलट तार ने की। उसकी तकनीक ने की। रेललाइन के साथ-साथ जाने वाले तार देश भर में फैल गए। भारत पर एकछत्र शासन लाने में तारघरों ने बड़ी मदद की।
तब तक भारतीय लोगों ने तार के जादू को समझ लिया था। एओ ह्यूम ने कांग्रेस की स्थापना के लिए तार के संदेशों का उपयोग किया था। आजादी की लड़ाई में तार का भरपूर उपयोग होने लगा। इस तरह जो तकनीक 1857 में दमन के लिए इस्तेमाल हुई वही आजादी की लड़ाई के लिए कारगर होने लगी। ‘भारत छोड़ो’ के दौरान आजादी के लिए लड़ने वालों ने कई जगह तार के खंभे इसीलिए उखाड़ दिए ताकि अंग्रेज इकट््ठे होकर दमन न कर सकें। संचार में बयालीस तक बहुत कुछ बदल गया था!
उसके बाद तार जनता के लिए दुख-सुख का तुरंत समाचार देने वाला माध्यम बन गया। उसका ज्यादा इस्तेमाल ज्यादातर फौज में, व्यापार में, राजनीति में और पत्रकारिता में होने लगा। जनता के बीच वह नौकरी की या शोक की खबर देने वाला माना जाने लगा। तार माध्यम से आगे बढ़ कर ‘संदेश’ बन गया। आते ही सबको सांप सूंघ जाता। सिपाहियों के मरने की खबर तार से आती। सर्वत्र शोक व्याप्त कर देती। तार से भावनात्मक संबंध ठहर गया। टेलीप्रिंटर आया और अखबारों को रिपोर्ताज मिलने लगे। खबरें ज्यादा ताजा होने लगीं।
सब चलता रहता अगर बेतार क्रांति और आगे वाली उपग्रह क्रांति न हुई होती, उससे जुड़ी ताबड़तोड़ टीवी, मोबाइल और इंटरनेट क्रांति एक के बाद एक न हुई होती।
और जैसा कि होता है, तकनीकी जिस गति से पिछले पचास साल में बदली है, उतनी तेजी से कुछ नहीं बदला। जितनी तेजी से तकनीकी बदली, उतनी ही तेजी से समाज का ढांचा, समाज का संचार और व्यवहार बदला।
टीवी आया तो पहली गाज सिनेमाघरों पर गिरी, नाटकोंपर गिरी। उसने इन दो विधाओं को आत्मसात कर लिया। किताब पर गिरी, उसे भी आत्मसात कर लिया। दुनिया देखते-देखते ग्लोबल विलेज बन गई।
इसके आगे के काम इंटरनेट और मोबाइल ने पूरे किए। सबको तुरता समय में सबसे जोड़ दिया। कनेक्टिविटी इतनी तेज और चपल हो गई कि काल का बंधन टूट गया।
संचार की नई तकनीकों के लगातार बदलाव का सबसे ज्यादा असर डाक और तार पर ही पड़ा। इंटरनेट ने, मोबाइल संदेशों ने चिट््ठी-पत्री बेकार कर दी। उदारीकरण ने डाकिए की जगह कूरियर को दे दी। मनीआॅर्डर की जगह टेली-मनीआॅर्डर ने ले ली। अब तो डाइरेक्ट कैश ट्रांसफर योजना ने इन सबको पीछे छोड़ दिया।
जिस दिन मोबाइल आया उसी दिन तारघर की सीमा समझ में आ गई थी। मोबाइल ने लोगों के बीच संवाद को इतना सरल कर दिया कि तारघर जाने की जगह एक एसएमएस ही काफी रहने लगा। तार कम होने लगे, मोबाइल बढ़ने लगे। मोबाइल के आगे तार सर्वत्र हारा, यहां भी हारा।
मोबाइल ने रील वाले कैमरे तक को बंद कर दिया। डिजिटल क्रांति ने मोबाइल रील वाले पुराने ढंग के मोबाइल कैमरे तक को बेकार कर दिया। अब हर आदमी कैमरामैन है, हर आदमी संपादक है, हर आदमी खरिया है कमाल है।
जिस पीढ़ी के हाथों मेंमोबाइल है- जिसमें कैमरा है, इंटरनेट है, रेडियो है- उसी ने तार के विदा होने पर सबसे ज्यादा नाटकीय दृश्य पैदा किए।
जिस दिन तार बंद किया गया उस दिन का नजारा मजेदार रहा। जिस युवा पीढ़ी के लोग कभी तारघर तक नहीं गए, सैकड़ों की संख्या में तारघर पहुंचे और चार रुपए के एक शब्द के रेट से राष्ट्रपति, राहुल गांधी और मनमोहन जी को तार दिए। कुछ ने तारघरों के आगे खडेÞ होकर अपने-अपने मोबाइल से एक दूसरे के फोटो खींचे। इस तरह से वे तार के ‘इतिहास’ में शामिल हुए।
फुकुयामा के ‘इतिहास का अंत’ की सिद्धांतिकी का मर्म इस घटना से समझा जा सकता है। जरा देखें: जिस मोबाइल ने तार की विदाई सुनिश्चित की, वह युवा पीढ़ी का जबर्दस्त संचार माध्यम है। मोबाइल क्रांति ने तार को पहले ही बेकार कर दिया था। जो मोबाइल पीढ़ी तार के लिए शोक मनाने आई वह मोबाइल सहित आई। वह चाहती तो न आती लेकिन तार के जाते हुए क्षण की वह गवाह होना चाहती थी। तार उसके लिए अजनबी था।
तार क्रांति ऐतिहासिक थी। तार आया तो प्रिंट मीडिया में खबर की रफ्तार बढ़ गई। सब अंग्रेजों की माया। उनका कब्जा। उनका सब्जा!
अपने शासन को मजबूत करने के लिए तार लाया गया। अगर तार न होता तो अंग्रेज अठारह सौ सत्तावन की क्रांति को न रोक पाते। इतिहास बताता है कि जब दिल्ली में क्रांतिकारियों का राज कायम हो गया तब लाल किले के पीछे-पीछे जाने वाले तारों के जरिए कलकत्ते तक एक अंग्रेज तार बाबू ने ही खबर पहुंचाई कि दिल्ली हाथ से निकल गई है, तुरत फौज भेजिए!
क्रांतिकारी सिपाहियों को यह पता नहीं था कि तार के जरिए भी अंग्रेज अपनी फौज मंगा कर विद्रोह को कुचल सकते हैं। यही हुआ। सिपाहियों को तोपों के मुंह पर बांध कर उड़ाया गया। दिल्ली पर अंग्रेज काबिज हो गए। इतिहास फिर फिरंगी के हवाले हो गया।
इतिहास की यह पलट तार ने की। उसकी तकनीक ने की। रेललाइन के साथ-साथ जाने वाले तार देश भर में फैल गए। भारत पर एकछत्र शासन लाने में तारघरों ने बड़ी मदद की।
तब तक भारतीय लोगों ने तार के जादू को समझ लिया था। एओ ह्यूम ने कांग्रेस की स्थापना के लिए तार के संदेशों का उपयोग किया था। आजादी की लड़ाई में तार का भरपूर उपयोग होने लगा। इस तरह जो तकनीक 1857 में दमन के लिए इस्तेमाल हुई वही आजादी की लड़ाई के लिए कारगर होने लगी। ‘भारत छोड़ो’ के दौरान आजादी के लिए लड़ने वालों ने कई जगह तार के खंभे इसीलिए उखाड़ दिए ताकि अंग्रेज इकट््ठे होकर दमन न कर सकें। संचार में बयालीस तक बहुत कुछ बदल गया था!
उसके बाद तार जनता के लिए दुख-सुख का तुरंत समाचार देने वाला माध्यम बन गया। उसका ज्यादा इस्तेमाल ज्यादातर फौज में, व्यापार में, राजनीति में और पत्रकारिता में होने लगा। जनता के बीच वह नौकरी की या शोक की खबर देने वाला माना जाने लगा। तार माध्यम से आगे बढ़ कर ‘संदेश’ बन गया। आते ही सबको सांप सूंघ जाता। सिपाहियों के मरने की खबर तार से आती। सर्वत्र शोक व्याप्त कर देती। तार से भावनात्मक संबंध ठहर गया। टेलीप्रिंटर आया और अखबारों को रिपोर्ताज मिलने लगे। खबरें ज्यादा ताजा होने लगीं।
सब चलता रहता अगर बेतार क्रांति और आगे वाली उपग्रह क्रांति न हुई होती, उससे जुड़ी ताबड़तोड़ टीवी, मोबाइल और इंटरनेट क्रांति एक के बाद एक न हुई होती।
और जैसा कि होता है, तकनीकी जिस गति से पिछले पचास साल में बदली है, उतनी तेजी से कुछ नहीं बदला। जितनी तेजी से तकनीकी बदली, उतनी ही तेजी से समाज का ढांचा, समाज का संचार और व्यवहार बदला।
टीवी आया तो पहली गाज सिनेमाघरों पर गिरी, नाटकोंपर गिरी। उसने इन दो विधाओं को आत्मसात कर लिया। किताब पर गिरी, उसे भी आत्मसात कर लिया। दुनिया देखते-देखते ग्लोबल विलेज बन गई।
इसके आगे के काम इंटरनेट और मोबाइल ने पूरे किए। सबको तुरता समय में सबसे जोड़ दिया। कनेक्टिविटी इतनी तेज और चपल हो गई कि काल का बंधन टूट गया।
संचार की नई तकनीकों के लगातार बदलाव का सबसे ज्यादा असर डाक और तार पर ही पड़ा। इंटरनेट ने, मोबाइल संदेशों ने चिट््ठी-पत्री बेकार कर दी। उदारीकरण ने डाकिए की जगह कूरियर को दे दी। मनीआॅर्डर की जगह टेली-मनीआॅर्डर ने ले ली। अब तो डाइरेक्ट कैश ट्रांसफर योजना ने इन सबको पीछे छोड़ दिया।
जिस दिन मोबाइल आया उसी दिन तारघर की सीमा समझ में आ गई थी। मोबाइल ने लोगों के बीच संवाद को इतना सरल कर दिया कि तारघर जाने की जगह एक एसएमएस ही काफी रहने लगा। तार कम होने लगे, मोबाइल बढ़ने लगे। मोबाइल के आगे तार सर्वत्र हारा, यहां भी हारा।
मोबाइल ने रील वाले कैमरे तक को बंद कर दिया। डिजिटल क्रांति ने मोबाइल रील वाले पुराने ढंग के मोबाइल कैमरे तक को बेकार कर दिया। अब हर आदमी कैमरामैन है, हर आदमी संपादक है, हर आदमी खरिया है कमाल है।
जिस पीढ़ी के हाथों मेंमोबाइल है- जिसमें कैमरा है, इंटरनेट है, रेडियो है- उसी ने तार के विदा होने पर सबसे ज्यादा नाटकीय दृश्य पैदा किए।
जिस दिन तार बंद किया गया उस दिन का नजारा मजेदार रहा। जिस युवा पीढ़ी के लोग कभी तारघर तक नहीं गए, सैकड़ों की संख्या में तारघर पहुंचे और चार रुपए के एक शब्द के रेट से राष्ट्रपति, राहुल गांधी और मनमोहन जी को तार दिए। कुछ ने तारघरों के आगे खडेÞ होकर अपने-अपने मोबाइल से एक दूसरे के फोटो खींचे। इस तरह से वे तार के ‘इतिहास’ में शामिल हुए।
फुकुयामा के ‘इतिहास का अंत’ की सिद्धांतिकी का मर्म इस घटना से समझा जा सकता है। जरा देखें: जिस मोबाइल ने तार की विदाई सुनिश्चित की, वह युवा पीढ़ी का जबर्दस्त संचार माध्यम है। मोबाइल क्रांति ने तार को पहले ही बेकार कर दिया था। जो मोबाइल पीढ़ी तार के लिए शोक मनाने आई वह मोबाइल सहित आई। वह चाहती तो न आती लेकिन तार के जाते हुए क्षण की वह गवाह होना चाहती थी। तार उसके लिए अजनबी था।
इसीलिए वह हाजिर रहना चाहती थी। मोबाइल ने उसे मारा यह जानते हुए भी वह तार को आखिरी बार देखने आई। यह दुख-रहित नाटकीय शोक था, यह सहानुभति-रहित गवाही थी कि वह मरा और उसे हमने मरते हुए देखा। फेसबुक पर, ट्विटर पर आती ओपीनियनें सुपरिचित वाग्विलास की तरह रहीं। कमतर शब्दों, उक्ति वैचित्र्य के उदाहरण रहीं।
उसकी चारों तरफ की दुनिया उसके लिए मोबाइल में, इंटरनेट में है। उसका सकल ज्ञान उसके विकीपीडिया में है। उसकी दुनिया उसके दिमाग में न होकर उसके यंत्र में है। दिमाग का भी वह न्यूनतम और इकहरा उपयोग करता है। प्रसन्न होकर तार को विदाई देना-फोटो खिंचवाना इतिहास बनाना है।
तात्कालिकता इतनी आवेगमय है कि हर क्षण दर्शनशास्त्र में बाद में पुराना पड़ता है, इस पीढ़ी के लिए पहले व्यतीत हो जाता है। वह उस व्यतीत को अपने में व्यापा नहीं मानती। वह उससे अलग कहीं और बीता हुआ होता है। यह उसकी ‘टाइमिंग’ है।
इस तात्कालिकता में पुराने के प्रति, अतीत के प्रति, व्यतीत के प्रति ‘लगावट’ नहीं है। वह ‘तुरंता’ (इस्टेंट) है। ठहराव रहित वह ‘दिग्भ्रम’ में रहता है। उसकी मानसिकता का पक्का नक्शा किसी के पास नहीं है। उसके मन की अवस्था पर कोई नोट नहीं लिखा गया। न कविता में न कहानी में। न उपन्यास में। उसके अंतर्मन में नहीं जाया गया। वे हर घर में, हर कहीं हैं, आबादी के पचपन फीसद बताए जाते हैं। राजनेता, विविध दल उनको अपनी ओर आकर्षित करने में लगे हैं। वे फेसबुक पर हैं, वे ट्विटर पर हैं, वे तुरंता उत्तेजक ओपीनियनों में हैं। वे परस्पर कटाक्षों में हैं, वे एक दूसरे को नीचा दिखाने वाले कमेंटों में हैं।
यह इस लेखक की मोबाइल मरीचिका में मगन युवाओं के अलबेले और अनजान मन को छूने की कोशिश भर है। यह उसके राग-विराग को, उसके अतीत-व्यतीत को, उसके वर्तमान को टटोलने की कोशिश भर है। कि जैसे आप उससे दो मिनट बात कर लिए हों। इसका मतलब यह नहीं है कि यह पीढ़ी अनुत्पादक है या अरचनात्मक है या कल्पना-रहित है या भविष्य-रहित है या असामाजिक है। वह हर हाल में ‘भिन्न सामाजिक’ है। उसका ‘भिन्न सामाजिक’ होना उसे एक ही साथ हमसे दूर करता है और अनिवार्य भी बनाता है।
उसकी लगावट देखनी हो तो तार की विदाई के साथ-साथ आ रहे उस बडेÞ विज्ञापन को भी देखा जा सकता है जिसमें अतीत से, पुराने से उसकी लगावट का एक नया अध्याय रचा जाता दिखता है।
यह एक कार कंपनी और एक अंग्रेजी अखबार का विज्ञापन है, जो कार की तरह और अखबार की तरह ही तुरंता तात्कालिक है। कार खरीदी जाते ही कीमत गिराती जाती है और नित नए मॉडलों में हर क्षण पुरानी होती जाती है; अखबार शाम तक रद्दी हो जाता है। कार-कबाड़ देखने के लिए आप दिल्ली की मध्यवर्गीय सोसाइटियों पर नजर दौड़ाइए तो मालूम हो जाएगा कि वहां कारें आदमियों से कहीं ज्यादा हैं। चार रुपए के अखबार की रद््दी दस रुपए किलो में बिकती है।
हम विज्ञापन पर लौटें: पुरानी चीजों का एक बहुत ऊंचा-सा बड़ा-सा ढेर एक जगह बना है जिसमें घर में काम आने वाली तमाम पुरानी चीजें फेंकी गई हैं; एक-दो लोग उसको लिए जा रह हैं फेंकने। अंधेरा है। तभी पार्श्व में एक कोरस गूंजने लगता है: तू तू करने में क्या है मजा/ अब हम ही मैं और मैं ही हम! गाना बजता है, उधर एक युवती एक मशाल लेकर उस पुराने ढेर में आग लगा देती है। लिखा आता है: आइ विल बी चेंज! यह संदेश देने वाली है एक कार कंपनी, एक अंग्रेजी अखबार!
पुरानी चीजों के साथ इस विज्ञापन में जो संबंध बन रहा है उसी तरह का संबंध एक अन्य विज्ञापन में बनाया जाता है कि जिसमें एक आॅनलाइन कंपनी को दिखा कर संदेश दिया जाता है। पुरानी कार हो गई बेच दे, पुरानी गिटार हो गई बेच दे। संदेश है: यहां सब कुछ बिकता है।
पुराने का जलना, हम ही मैं और मैं ही हम या उधर सब कुछ बिकता है कहना कानों में अनेकार्थ वाची हो उठता है।
यह है संदेशों के इशारों से मन का मैनेजमेंट!
यह पुरानी जीन्स और गिटार वाले गाने से आगे की बात है। बिकने में ‘विराग’ कुछ इस तरह पैदा हो रहा है कि पुरानी जीन्स और गिटार अतीत-राग, नॉस्टेल्जिया नहीं देते, कूड़े के ढेर में तजा दिए जाते हैं!
पुराने के पुनरुपयोग की जगह उसे बाहर फेंक देना, जला देना एक क्रूर क्रिया है। तारघर के सामने खड़े होकर फोटो खिंचवाना ऐसी ही क्रिया है।
कैसे दुकानदार आपकी जेब से पैसे निकालते हैं
क्या आपने कभी सोचा है कि क्यों सुपर बाज़ार में चॉकलेट उस जगह रखी होती हैं जहां बिल बनते हैं। क्यों साबुन या शक्कर जैसी चीज़ें उस जगह रखी होती हैं जहां पहुंचने के लिए आपको पूरी दुकान से गुज़रना होता है।
या फिर क्यों किशोरों के इस्तेमाल की चीज़ें जैसे टीशर्ट या डीओडोरेंट कुछ बेतरतीब ढंग से रखी होती हैं। इत्र, गहने और मेकप का सामान दुकान में सामने घुसते ही मिलता है।
संयोग नहीं विज्ञान
आज पूरी दुनिया में ग्राहक ज़्यादा चतुर सुजान होता जा रहा है। चारों तरफ फ़ैली आर्थिक अनिश्चितता के चलते लोग सोच समझ कर खर्च करने का प्रयास कर रहे हैं। बड़े दुकानदार 'तू डाल-डाल मैं पात-पात वाला खेल' खेल रहे हैं।
हममें से बहुत लोग यह समझते हैं कि यह सब ललचाने की कोशिश है लेकिन बावजूद इसके हमेशा इन फंदों से बच नहीं पाते।
पैसे बचाने के विशेषज्ञ मार्टिन लुइस कहते हैं "जब खरीददारी की बात होती है तो हम सब के अंदर एक बच्चा होता है। हर दुकानदार का ध्येय यह रहता है कि किस तरह आपको यह अहसास दिलाया जाए कि आप कम पैसों में ज़्यादा मूल्यवान चीज़ें ले रहे हैं। आपका ध्येय उनको पैसा कमाने से रोकना होना चाहिए।"
ब्रिटेन में बीबीसी लैब यूके बिग मनी टेस्ट के एक शोध का कहना है कि आपकी आर्थिक स्थिति को आपके आर्थिक मामलों का ज्ञान, पढ़ाई, आमदनी और सामाजिक परिवेश सब मिला कर भी 'अचानक की गई खरीददारी' जितना प्रभावित नहीं करते।
दुनियाभर में सुपर बाज़ार के महारथियों की कुछ चुनिंदा तरकीबें।
सोची समझी बेतरतीबी
पूरे समय मॉल की शॉपिंग फ़्लोर को साफ़ करने की जगह वहां काम करने वाले एक सोचे समझे तरीके से चीज़ों को बेतरतीब भी करते हैं। ऐसा वो इसलिए करते हैं क्योंकि लोगों को देख कर लगे कि इन चीज़ों को खूब देखा और लिया जा रहा है।
यह तरकीब युवाओं पर, खास तौर से 21 साल से कम उम्र के लोगों पर अधिक कारगर होती है जो मचल कर अचानक खरीददारी करते हैं।
उपभोक्ताआ व्यवहार के विशेषज्ञ फ़िलिप ग्रेव्स कहते हैं कि युवाओं को इस बात से बहुत फ़र्क पड़ता है कि दूसरे क्या खरीद रहे हैं। ग्रेव्स के अनुसार युवा अपने माता पिता से अलग उस तरह के दिखना चाहते हैं जो उन्हें लगता है कि उनसे मिलते जुलते हैं।
इसके वैज्ञानिक कारण हैं। ब्रिटेन की ओपन यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर मार्क ओ क्रीवी कहते हैं कि "युवाओं के दिमाग का वो हिस्सा जो उन्हें मचल उठने से रोके वो अधिक विकसित नहीं होता है।"
ब्रांड छुपाना
यह एक ऐसे मौके पर किया जाता है जब चारों तरफ आर्थिक संकट व्याप्त हो जैसा की अभी दुनिया के ज़्यादातर हिस्से में है। ऐसे समय में वो लोग जिनकी आमदनी कम नहीं हुई है वो भी संभल कर खर्च करते हैं और सस्ती चीजें खरीदने की कोशिश करते हैं।
उपभोक्ता मामलों के जानकार जोसेफ़ स्टेटन कहते हैं "जब लोगों के पास पैसे कम होते हैं तो वो केवल सस्ता ही नहीं खरीदना चाहते। वो यह भी मानना चाहते कि उनका निर्णय सही है।"
इस तरह की भावना को बल देने के लिए सामान से 'सस्ता' या 'किफायती' जैसे शब्द हटा दिए जाते हैं और उसकी जगह 'उचित मूल्य' और 'समझदारी पूर्ण निर्णय' की बात की जाती है।
जैसी जगह वैसा ऑफ़र
गूगल और फ़ेसबुक पर आप पहले से ही केवल उस तरह के विज्ञापन देखते हैं जो आपकी पसंद से मिलते हैं अब इस डाटा का उपयोग बड़े दुकानदार ख़ास इलाकों और दुकानों पर भी करना आरंभ कर रहे हैं।
वो उस इलाके में प्रचलित चीज़ों के लिए ख़ास ऑफ़र लाते हैं जिससे आप उनका सामान खरीदने के लिए मजबूर हो जाएं। ऐसे ऑफ़र उनकी हर दुकान और हर शहर में उपलब्ध नहीं होते।
आपकी नज़रों पर निगाह
पश्चिम में कई देशों में यह शुरू हो गया है और भारत में भी यह तकनीक जल्द ही यह आ सकती है। आम तौर पर लोग परफ़्यूम की दुकानों के पास से गुज़रते हैं इत्र का सैंपल देखते हैं निकल जाते हैं।
अब शेल्फ़ के ऊपर लगा एक कैमरा आपकी नज़रों को पढ़ेगा और आपकी आंखें जहां ठिठक रहीं हैं उस ब्रांड के परफ़्यूम के बारे में पास की लगे स्क्रीन पर चित्र दिखाना आरंभ कर देगा।
एक अन्य विशेषज्ञ पॉल डोई कहते हैं "यह उपभोक्ता तो चौंकाता है उसे ललचाता है।" गूची जैसे ब्रांड ऐसा कर रहे हैं।
कई सॉफ्टवेयर आपके बारे में बहुत ज़्यादा जानकारी चुटकियों में जुटा सकते हैं। मसलन आपकी उम्र, लिंग और आपकी पसंद और उस हिसाब से वो आपको विज्ञापन दिखाते हैं।
या फिर क्यों किशोरों के इस्तेमाल की चीज़ें जैसे टीशर्ट या डीओडोरेंट कुछ बेतरतीब ढंग से रखी होती हैं। इत्र, गहने और मेकप का सामान दुकान में सामने घुसते ही मिलता है।
संयोग नहीं विज्ञान
आज पूरी दुनिया में ग्राहक ज़्यादा चतुर सुजान होता जा रहा है। चारों तरफ फ़ैली आर्थिक अनिश्चितता के चलते लोग सोच समझ कर खर्च करने का प्रयास कर रहे हैं। बड़े दुकानदार 'तू डाल-डाल मैं पात-पात वाला खेल' खेल रहे हैं।
हममें से बहुत लोग यह समझते हैं कि यह सब ललचाने की कोशिश है लेकिन बावजूद इसके हमेशा इन फंदों से बच नहीं पाते।
पैसे बचाने के विशेषज्ञ मार्टिन लुइस कहते हैं "जब खरीददारी की बात होती है तो हम सब के अंदर एक बच्चा होता है। हर दुकानदार का ध्येय यह रहता है कि किस तरह आपको यह अहसास दिलाया जाए कि आप कम पैसों में ज़्यादा मूल्यवान चीज़ें ले रहे हैं। आपका ध्येय उनको पैसा कमाने से रोकना होना चाहिए।"
ब्रिटेन में बीबीसी लैब यूके बिग मनी टेस्ट के एक शोध का कहना है कि आपकी आर्थिक स्थिति को आपके आर्थिक मामलों का ज्ञान, पढ़ाई, आमदनी और सामाजिक परिवेश सब मिला कर भी 'अचानक की गई खरीददारी' जितना प्रभावित नहीं करते।
दुनियाभर में सुपर बाज़ार के महारथियों की कुछ चुनिंदा तरकीबें।
सोची समझी बेतरतीबी
पूरे समय मॉल की शॉपिंग फ़्लोर को साफ़ करने की जगह वहां काम करने वाले एक सोचे समझे तरीके से चीज़ों को बेतरतीब भी करते हैं। ऐसा वो इसलिए करते हैं क्योंकि लोगों को देख कर लगे कि इन चीज़ों को खूब देखा और लिया जा रहा है।
यह तरकीब युवाओं पर, खास तौर से 21 साल से कम उम्र के लोगों पर अधिक कारगर होती है जो मचल कर अचानक खरीददारी करते हैं।
उपभोक्ताआ व्यवहार के विशेषज्ञ फ़िलिप ग्रेव्स कहते हैं कि युवाओं को इस बात से बहुत फ़र्क पड़ता है कि दूसरे क्या खरीद रहे हैं। ग्रेव्स के अनुसार युवा अपने माता पिता से अलग उस तरह के दिखना चाहते हैं जो उन्हें लगता है कि उनसे मिलते जुलते हैं।
इसके वैज्ञानिक कारण हैं। ब्रिटेन की ओपन यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर मार्क ओ क्रीवी कहते हैं कि "युवाओं के दिमाग का वो हिस्सा जो उन्हें मचल उठने से रोके वो अधिक विकसित नहीं होता है।"
ब्रांड छुपाना
यह एक ऐसे मौके पर किया जाता है जब चारों तरफ आर्थिक संकट व्याप्त हो जैसा की अभी दुनिया के ज़्यादातर हिस्से में है। ऐसे समय में वो लोग जिनकी आमदनी कम नहीं हुई है वो भी संभल कर खर्च करते हैं और सस्ती चीजें खरीदने की कोशिश करते हैं।
उपभोक्ता मामलों के जानकार जोसेफ़ स्टेटन कहते हैं "जब लोगों के पास पैसे कम होते हैं तो वो केवल सस्ता ही नहीं खरीदना चाहते। वो यह भी मानना चाहते कि उनका निर्णय सही है।"
इस तरह की भावना को बल देने के लिए सामान से 'सस्ता' या 'किफायती' जैसे शब्द हटा दिए जाते हैं और उसकी जगह 'उचित मूल्य' और 'समझदारी पूर्ण निर्णय' की बात की जाती है।
जैसी जगह वैसा ऑफ़र
गूगल और फ़ेसबुक पर आप पहले से ही केवल उस तरह के विज्ञापन देखते हैं जो आपकी पसंद से मिलते हैं अब इस डाटा का उपयोग बड़े दुकानदार ख़ास इलाकों और दुकानों पर भी करना आरंभ कर रहे हैं।
वो उस इलाके में प्रचलित चीज़ों के लिए ख़ास ऑफ़र लाते हैं जिससे आप उनका सामान खरीदने के लिए मजबूर हो जाएं। ऐसे ऑफ़र उनकी हर दुकान और हर शहर में उपलब्ध नहीं होते।
आपकी नज़रों पर निगाह
पश्चिम में कई देशों में यह शुरू हो गया है और भारत में भी यह तकनीक जल्द ही यह आ सकती है। आम तौर पर लोग परफ़्यूम की दुकानों के पास से गुज़रते हैं इत्र का सैंपल देखते हैं निकल जाते हैं।
अब शेल्फ़ के ऊपर लगा एक कैमरा आपकी नज़रों को पढ़ेगा और आपकी आंखें जहां ठिठक रहीं हैं उस ब्रांड के परफ़्यूम के बारे में पास की लगे स्क्रीन पर चित्र दिखाना आरंभ कर देगा।
एक अन्य विशेषज्ञ पॉल डोई कहते हैं "यह उपभोक्ता तो चौंकाता है उसे ललचाता है।" गूची जैसे ब्रांड ऐसा कर रहे हैं।
कई सॉफ्टवेयर आपके बारे में बहुत ज़्यादा जानकारी चुटकियों में जुटा सकते हैं। मसलन आपकी उम्र, लिंग और आपकी पसंद और उस हिसाब से वो आपको विज्ञापन दिखाते हैं।
आखिर कैसे बचें इस महामारी से
आज चाहे हम कितने भी आधुनिक हो गए हो या हम उन्नति के रथ पर सवार हो लेकिन सच तो यह है कि आज भी कई ऐसी चीजें हैं जिन पर हमारा कोई नियंत्रण नहीं और इन्हीं में से एक है कैंसर. आज कैंसर को लाइलाज कहना तो गलत है लेकिन कैंसर से होने वाला नुकसान कई बार आम आदमी की जिंदगी खत्म कर देता है. हर वर्ष 04 फरवरी को विश्व कैंसर दिवस मनाया जाता है.
World Cancer Day: विश्व कैंसर दिवस
एक अनुमान के मुताबिक 2005 में 7.6 लाख लोग कैंसर से मौत के आगोश में समा गए थे. इतनी बड़ी संख्या में लोगों के मरने से और विश्व स्तर पर इस बीमारी के फैलने से सब चिंतित हैं. इसी कारण विश्व स्वास्थ्य संगठन ने हर साल 4 फरवरी को विश्व कैंसर दिवस की तरह मनाने का निर्णय लिया ताकि इस भयानक बीमारी के प्रति लोगों में जागरुकता फैलाई जा सके.
विश्व कैंसर दिवस की शुरुआत विश्व में कैंसर के प्रति जागरुकता और इसके बचाव के तरीकों के बारें में अधिक से अधिक लोगों को परिचित कराने के लिए हुई थी. साल 2006 में पहली बार विश्व कैंसर दिवस मनाया गया था.
What is Cancer: कैंसर
कैंसर आज दुनिया में एक ऐसी बीमारी बन चुकी है जिसका नाम सुनते ही कई लोगों के पैरों तले जमीन खिसक जाती है. जानकार मानते हैं कि कैंसर लाइलाज नहीं है बस जरूरत है इसका सही समय पर पता चलने की और सही इलाज की. एक आम आदमी के लिए यह जरूर एक लाइलाज बीमारी हो सकती है लेकिन इसका महंगा इलाज इसे अमीर लोगों के लिए साध्य बनाता है. यह समाज के लिए बहुत बुरा है कि कैंसर जैसे रोग भी अमीर और गरीब के बीच अंतर देखते हैं.
कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी पूरे विश्व में समस्या का विषय है और इस बीमारी का इलाज पता करने की जिम्मेदारी न केवल डॉक्टरों व वैज्ञानिकों की है बल्कि हममें से हर किसी की है.
आइए आज हम कैंसर के बारें में जानें और अन्य लोगों को भी इस भयानक बीमारी के बारें में जागरुक बनाएं.
Causes of Cancer: कैंसर के लक्षण
- आमतौर पर शरीर के किसी भी भाग पर ऊतकों में असामान्य रूप से गांठ बनना या उभार आना कैंसर हो सकता है.
- कोशिकाओं का असामान्य तौर पर वृद्धि करना और अनियंत्रित रूप से विभाजित होने से कैंसर होता है.
- कैंसर के किसी भी लक्षण के दिखने पर उसकी जांच तुरंत करवाए जाने की ज़रूरत है और कैंसर के लक्षणों को भी आसानी से पहचाना जा सकता है.
Cancer Causes and Risk Factors: कैंसर का इलाज
कैंसर का पता बायोप्सी नामक टेस्ट से चलता है. इसके बाद कैंसर का पता लगाने के बाद जो इलाज किया जाता है, उसमें कीमोथेरेपी प्रमुख है. कीमोथेरेपी कैंसर के असर को कम करने के लिए दी जाती है. उदाहरण के लिए अगर कैंसर चौथी स्टेज पर हो तो यह थैरेपी इसे दूसरी स्टेज पर ले आती है. यह हर तरह के कैंसर में नहीं दी जा सकती. इसी तरह रेडियोथेरेपी शरीर में कैंसर के ऊतकों को कम करने के लिए दी जाती है.
डॉक्टर मानते हैं कि कैंसर ठीक हो सकता है बशर्ते इसका डटकर सामना किया जाए. हमें इससे डरना नहीं चाहिए. कैंसर पर विजय हासिल करने में इन सुझावों पर ध्यान दें:
* जांच होने के बाद कैंसर के उपचार का पहला अवसर ही सर्वश्रेष्ठ अवसर है. इस अवसर को गंवाना जानलेवा हो सकता है.
* निकट के कैंसर संस्थान का ही उपचार के लिए चयन करें, ताकि आप लम्बे इलाज के लिए आवश्यकतानुसार समय-समय पर अपने विशेषज्ञ के पास पहुंच सकें.
* कैंसर विशेषज्ञ की ही बातों पर अमल करें. गैर-जानकार व्यक्ति की सुनी-सुनाई बातों को सुन आप भ्रमित हो सकते हैं.
* बॉयोप्सी जांच से कैंसर फैलता नहीं है. इस गलत धारणा के कारण बहुत से लोग अपना उपचार समय से न कराकर मर्ज बढ़ा लेते हैं. बॉयोप्सी से ही कैंसर के प्रकार व संभावित उपचार का निर्धारण होता है.
* कैंसर विशेषज्ञ से रोग की वार्षिक जांच कराते रहने से रोग का प्रारंभिक अवस्था में पता चल जाता है. प्रारंभिक अवस्था में अधिकांश कैंसर पूरी तरह से ठीक हो जाते हैं, बशर्ते आप पूरी तरह से मन लगाकर उपचार में जुट जाएं.
कैंसर की रोकथाम के कुछ उपाय:
* सिगरेट व शराब का सेवन कम करें इनसे फेफड़ों, सिर व गले के कैंसर का खतरा हो सकता है.
* ज्यादा तला भुना व वसा युक्त भोजन कम खाएं, इससे ब्रेस्ट व प्रोस्ट्रेट कैंसर का खतरा होता है.
* स्वस्थ रहने के लिए रोज व्यायाम करें.
* फेफड़ो के कैंसर से बचने के लिए किसी भी प्रकार के केमिकल्स जैसे फंगीसाइड, इंसेक्टिसाइड, पेन्ट, क्लीनर से दूर रहें.
* अपने जीवनसाथी के प्रति वफादार रहें.
* गर्मियों के मौसम में सूरज की किरणों के संपर्क में आने से बचें, ऐसा करके आप स्किन कैंसर से बच सकते हैं.
* अपनी सुरक्षा के लिए ब्रेस्ट व प्रोस्ट्रेट कैंसर से बचने के लिए कुछ रेगुलर चेकअप कराते रहें.
कैंसर से चिकित्सा के कुछ उपाय:
* रेडिएशन्स की मदद से कैंसर को ठीक किया जा सकता है. एक नई चिकित्सा पद्धति के अनुसार अब रेडिएशन्स की मदद से चिकित्सा के दौरान दूसरे शरीर के भागों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता.
* कीमोथेरेपी की मदद से भी कैंसर का इलाज संभव है.
विश्व को कैंसर मुक्त करने के लिए आप भी कदम बढ़ाएं और खुद तथा अपने सगे सबंधियों को तंबाकू, सिगरेट, शराब आदि से दूर रहने की सलाह दीजिए.
विडंबना या नियति: नारी की समानता पर छलनी है कानून
चौंसठ साल के आजाद हिंदुस्तान ने भारतीय महिलाओं को विश्व पटल पर छाते देखा, अंतरिक्ष पर जाते देखा पर अपनी ही भूमि पर उन्हें बराबरी का हक नहीं दिला सका। समानता के लिए सदियों से चली आ रही आम महिला की जंग अभी खत्म नहीं हुई। शक्ति और धैर्य का पर्याय मानी जाने वाली महिला को समानता दिलाने में पुराने कानून असमर्थ हैं। इस छलनी में तमाम छेद हैं पर देखने वालों की नजर में सब ठीक है।
21वीं सदी में भी पति के जारकर्म (अनैतिक संबंध) के खिलाफ पत्नी आपराधिक मामला नहीं दर्ज करा सकती। मसला चाहे तलाक लेने पर पति की संपत्ति पर हक का हो या सड़क पर पीछा करने वाले के खिलाफ कार्रवाई का, महिलाओं के बचाव में कानून फिलहाल निर्वात में है। इसे दुर्भाग्य कहें या बदलाव की बयार की कछुआ चाल। स्वतंत्रता के 64 साल बाद भी देश गर्व से नहीं कह सकता कि यहां महिलाओं को समान अधिकार प्राप्त हैं।
1. सड़क दुर्घटना में घरेलू महिला (हाउस वाइफ) को कम मुआवजा दिया जाता है। मोटर वाहन अधिनियम की धारा 6 में आय के आधार पर मुआवजा तय है। इस धारा में दुर्घटना के पीड़ितों को दो वर्ग में बांटा गया है। पहला न कमाने वाला व्यक्ति, दूसरा पत्नी। इसमें घरेलू महिला के दुर्घटनाग्रस्त होने या मौत पर पति की आय के एक तिहाई हिस्से को मुआवजे का आधार बनाया जाता है। यह वर्गीकरण घरेलू महिलाओं के महत्व का समुचित मूल्यांकन नहीं है। घर के सभी कामकाज महिलाओं के हवाले होते हैं। ऐसे में उनकी उपयोगिता का मूल्य स्पष्ट है।
2. जारकर्म (अडल्ट्री) कानून में पति को अपनी पत्नी के साथ संबंध रखने वाले व्यक्ति के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 497 के तहत कार्रवाई का अधिकार प्रदान करता है। लेकिन पत्नी को पति के साथ संबंध रखने वाली महिला के खिलाफ कानूनी कार्रवाई का कोई अधिकार नहीं दिया गया है। यदि पति के साथ कोई महिला सहमति से संबंध रखती है तो पत्नी कुछ नहीं कर सकती। यहां पर कानूनी तौर पर पत्नी यानी महिला के साथ समान व्यवहार नहीं किया गया है। इस कानून पर कई सालों से बहस जारी है। लेकिन अब तक इसमें संशोधन करने पर विचार तक नहीं किया गया है।
3. सेना के कानून में सेवाएं देने के मामले में भी महिलाओं को समान अधिकार नहीं है। उनसे सिर्फ अस्थायी कमीशन के तहत सेवाएं ली जाती रही हैं। इस मुद्दे पर हाईकोर्ट महिलाओं के पक्ष में फैसला दे चुका है और अब मामला सर्वोच्च अदालत में है। सेना अधिनियम-1950 में जारी इस असमानता के खिलाफ अस्थायी कमीशन पर नौकरी कर रही महिलाएं मोर्चा संभाले हैं। लेकिन महिलाओं के समान अधिकार का हल्ला मचाने वाली सरकार भी सेना के इस तर्क से सहमत है कि नाजुक काया को जंग के मैदान पर भेजना मुसीबत को दावत देना होगा।
4. बाबुल की गलियां छोड़ पति के साथ घर बनाने वाली महिला को समान अधिकार नहीं है। पति यदि तलाक लेता है तो पत्नी का उसकी संपत्ति पर कोई अधिकार नहीं रहता। उसे गुजारे भत्ते के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाना पड़ता है। जहां एकमुश्त या मासिक भत्ते की राशि तय की जाती है। पति बेरोजगार है तो पत्नी के लिए बड़ी परेशानी है। वह उससे कुछ नहीं ले सकती। भले ही पति के पास संपत्ति हो और निजी तौर पर वह उसका उपयोग कर रहा हो। कानूनविदों के बीच पति की संपत्ति पर पत्नी को समान अधिकार प्रदान करने की बहस कई बार छिड़ी है। लेकिन अब तक बेनतीजा।
5. कार्यालयों में महिलाओं के यौन उत्पीड़न पर सरकार ने सर्वोच्च अदालत की ओर से 1997 में फैसला जारी करने के बावजूद इस पर कानून बनाने की तकलीफ नहीं की। पूरे देश में फैसले में अदालत की ओर से जारी किए गए दिशा-निर्देशों का अनुपालन कराने में भी सरकार अब तक पूरी तरह से सक्षम नहीं है। क्योंकि घर चलाने के लिए बाहर निकलने वाली महिलाओं को इसकी शिकायत करने पर भी तमाम मुसीबतों का सामना करना पड़ता है। उन पहलुओं पर देश की सत्ता चलाने वालों ने गौर करना भी उचित नहीं समझा है। तमाम सर्वेक्षणों में यह सामने आया है कि भारत में काम करने वाली महिलाओं को कार्यालयों में आए-दिन यौन उत्पीड़न का शिकार होना पड़ता है।
21वीं सदी में भी पति के जारकर्म (अनैतिक संबंध) के खिलाफ पत्नी आपराधिक मामला नहीं दर्ज करा सकती। मसला चाहे तलाक लेने पर पति की संपत्ति पर हक का हो या सड़क पर पीछा करने वाले के खिलाफ कार्रवाई का, महिलाओं के बचाव में कानून फिलहाल निर्वात में है। इसे दुर्भाग्य कहें या बदलाव की बयार की कछुआ चाल। स्वतंत्रता के 64 साल बाद भी देश गर्व से नहीं कह सकता कि यहां महिलाओं को समान अधिकार प्राप्त हैं।
1. सड़क दुर्घटना में घरेलू महिला (हाउस वाइफ) को कम मुआवजा दिया जाता है। मोटर वाहन अधिनियम की धारा 6 में आय के आधार पर मुआवजा तय है। इस धारा में दुर्घटना के पीड़ितों को दो वर्ग में बांटा गया है। पहला न कमाने वाला व्यक्ति, दूसरा पत्नी। इसमें घरेलू महिला के दुर्घटनाग्रस्त होने या मौत पर पति की आय के एक तिहाई हिस्से को मुआवजे का आधार बनाया जाता है। यह वर्गीकरण घरेलू महिलाओं के महत्व का समुचित मूल्यांकन नहीं है। घर के सभी कामकाज महिलाओं के हवाले होते हैं। ऐसे में उनकी उपयोगिता का मूल्य स्पष्ट है।
2. जारकर्म (अडल्ट्री) कानून में पति को अपनी पत्नी के साथ संबंध रखने वाले व्यक्ति के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 497 के तहत कार्रवाई का अधिकार प्रदान करता है। लेकिन पत्नी को पति के साथ संबंध रखने वाली महिला के खिलाफ कानूनी कार्रवाई का कोई अधिकार नहीं दिया गया है। यदि पति के साथ कोई महिला सहमति से संबंध रखती है तो पत्नी कुछ नहीं कर सकती। यहां पर कानूनी तौर पर पत्नी यानी महिला के साथ समान व्यवहार नहीं किया गया है। इस कानून पर कई सालों से बहस जारी है। लेकिन अब तक इसमें संशोधन करने पर विचार तक नहीं किया गया है।
3. सेना के कानून में सेवाएं देने के मामले में भी महिलाओं को समान अधिकार नहीं है। उनसे सिर्फ अस्थायी कमीशन के तहत सेवाएं ली जाती रही हैं। इस मुद्दे पर हाईकोर्ट महिलाओं के पक्ष में फैसला दे चुका है और अब मामला सर्वोच्च अदालत में है। सेना अधिनियम-1950 में जारी इस असमानता के खिलाफ अस्थायी कमीशन पर नौकरी कर रही महिलाएं मोर्चा संभाले हैं। लेकिन महिलाओं के समान अधिकार का हल्ला मचाने वाली सरकार भी सेना के इस तर्क से सहमत है कि नाजुक काया को जंग के मैदान पर भेजना मुसीबत को दावत देना होगा।
4. बाबुल की गलियां छोड़ पति के साथ घर बनाने वाली महिला को समान अधिकार नहीं है। पति यदि तलाक लेता है तो पत्नी का उसकी संपत्ति पर कोई अधिकार नहीं रहता। उसे गुजारे भत्ते के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाना पड़ता है। जहां एकमुश्त या मासिक भत्ते की राशि तय की जाती है। पति बेरोजगार है तो पत्नी के लिए बड़ी परेशानी है। वह उससे कुछ नहीं ले सकती। भले ही पति के पास संपत्ति हो और निजी तौर पर वह उसका उपयोग कर रहा हो। कानूनविदों के बीच पति की संपत्ति पर पत्नी को समान अधिकार प्रदान करने की बहस कई बार छिड़ी है। लेकिन अब तक बेनतीजा।
5. कार्यालयों में महिलाओं के यौन उत्पीड़न पर सरकार ने सर्वोच्च अदालत की ओर से 1997 में फैसला जारी करने के बावजूद इस पर कानून बनाने की तकलीफ नहीं की। पूरे देश में फैसले में अदालत की ओर से जारी किए गए दिशा-निर्देशों का अनुपालन कराने में भी सरकार अब तक पूरी तरह से सक्षम नहीं है। क्योंकि घर चलाने के लिए बाहर निकलने वाली महिलाओं को इसकी शिकायत करने पर भी तमाम मुसीबतों का सामना करना पड़ता है। उन पहलुओं पर देश की सत्ता चलाने वालों ने गौर करना भी उचित नहीं समझा है। तमाम सर्वेक्षणों में यह सामने आया है कि भारत में काम करने वाली महिलाओं को कार्यालयों में आए-दिन यौन उत्पीड़न का शिकार होना पड़ता है।
नेताजी सुभाष चन्द्र बोस जयंती विशेष
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के महानायक, आजाद हिन्द फौज के संस्थापक और जय हिन्द का नारा देने वाले सुभाष चन्द्र बोस जी की आज जयंती है. 23 जनवरी 1897 को उड़ीसा के कटक नामक नगरी में सुभाष चन्द्र बोस का जन्म हुआ था. अपनी विशिष्टता तथा अपने व्यक्तित्व एवं उपलब्धियों की वजह से सुभाष चन्द्र बोस भारत के इतिहास में एक महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं.
स्वाधीनता संग्राम के अन्तिम पच्चीस वर्षों के दौरान उनकी भूमिका एक सामाजिक क्रांतिकारी की रही और वे एक अद्वितीय राजनीतिक योद्धा के रूप में उभर के सामने आए. सुभाष चन्द्र बोस का जन्म उस समय हुआ जब भारत में अहिंसा और असहयोग आन्दोलन अपनी प्रारम्भिक अवस्था में थे. इन आंदोलनों से प्रभावित होकर उन्होंने भारत छोड़ो आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई. पेशे से बाल चिकित्सक डॉ बोस ने नेताजी की राजनीतिक और वैचारिक विरासत के संरक्षण के लिए नेताजी रिसर्च ब्यूरो की स्थापना की. नेताजी का योगदान और प्रभाव इतना बडा था कि कहा जाता हैं कि अगर आजादी के समय नेताजी भारत में उपस्थित रहते, तो शायद भारत एक संघ राष्ट्र बना रहता और भारत का विभाजन न होता.
शुरुआत में तो नेताजी की देशसेवा करने की बहुत मंशा थी पर अपने परिवार की वजह से उन्होंने विदेश जाना स्वीकार किया. पिता के आदेश का पालन करते हुए वे 15 सितम्बर 1919 को लंदन गए और वहां कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में अध्ययन करने लगे. वहां से उन्होंने आई.सी.एस. की परीक्षा उत्तीर्ण की और योग्यता सूची में चौथा स्थान प्राप्त किया. पर देश की सेवा करने का मन बना चुके नेताजी ने आई.सी.एस. से त्याग पत्र दे दिया.
भारत आकर वे देशबंधु चितरंजन दास के सम्पर्क में आए और उन्होंने उनको अपना गुरु मान लिया और कूद पड़े देश को आजाद कराने. चितरंजन दास के साथ उन्होंने कई अहम कार्य किए जिनकी चर्चा इतिहास का एक अहम हिस्सा बन चुकी है. स्वतंत्रता संग्राम के दौरान सुभाष चन्द्र बोस की सराहना हर तरफ हुई. देखते ही देखते वह एक महत्वपूर्ण युवा नेता बन गए. पंडित जवाहरलाल नेहरू के साथ सुभाषबाबू ने कांग्रेस के अंतर्गत युवकों की इंडिपेंडेंस लीग शुरू की.
लेकिन बोस के गर्म और तीखे तेवरों को कांग्रेस का नरम व्यवहार ज्यादा पसंद नहीं आया. उन्होंने 29 अप्रैल 1939 को कलकत्ता में हुई कांग्रेस की बैठक में अपना त्याग पत्र दे दिया और 3 मई 1939 को सुभाषचन्द्र बोस ने कलकत्ता में फॉरवर्ड ब्लाक अर्थात अग्रगामी दल की स्थापना की. सितम्बर 1939 में द्वितीय विश्व युद्व प्रांरभ हुआ. ब्रिटिश सरकार ने सुभाष के युद्ध विरोधी आन्दोलन से भयभीत होकर उन्हें गिरफ्तार कर लिया. सन् 1940 में सुभाष को अंग्रेज सरकार ने उनके घर पर ही नजरबंद कर रखा था. नेताजी अदम्य साहस और सूझबूझ का परिचय देते हुए सबको छकाते हुए घर से भाग निकले.
नेताजी ने एक मुसलमान मौलवी का वेष बनाकर पेशावर अफगानिस्तान होते हुए बर्लिग तक का सफर तय किया. बर्लिन में जर्मनी के तत्कालीन तानाशाह हिटलर से मुलाकात की और भारत को स्वतंत्र कराने के लिए जर्मनी व जापान से सहायता मांगी. जर्मनी में भारतीय स्वतंत्रता संगठन और आजाद हिंद रेडियो की स्थापना की. इसी दौरान सुभाषबाबू, नेताजी नाम से जाने जाने लगे. पर जर्मनी भारत से बहुत दूर था. इसलिए 3 जून 1943 को उन्होंने पनडुब्बी से जापान के लिए प्रस्थान किया. पूर्व एशिया और जापान पहुंच कर उन्होंने आजाद हिन्द फौज का विस्तार करना शुरु किया. पूर्व एशिया में नेताजी ने अनेक भाषण करके वहाँ स्थानीय भारतीय लोगों से आज़ाद हिन्द फौज में भरती होने का और आर्थिक मदद करने का आह्वान किया. उन्होंने अपने आह्वान में संदेश दिया “तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हे आजादी दूँगा.”
द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान आज़ाद हिन्द फौज ने जापानी सेना के सहयोग से भारत पर आक्रमण किया. अपनी फौज को प्रेरित करने के लिए नेताजी ने “दिल्ली चलो” का नारा दिया. दोनों फौजों ने अंग्रेजों से अंडमान और निकोबार द्वीप जीत लिए पर अंत में अंग्रेजों का पलड़ा भारी पड़ा और आजाद हिन्द फौज को पीछे हटना पड़ा.
6 जुलाई, 1944 को आजाद हिंद रेडियो पर अपने भाषण के माध्यम से गाँधीजी से बात करते हुए, नेताजी ने जापान से सहायता लेने का अपना कारण और आज़ाद हिन्द फौज की स्थापना के उद्देश्य के बारे में बताया. इस भाषण के दौरान, नेताजी ने गांधीजी को राष्ट्रपिता बुलाकर अपनी जंग के लिए उनका आशिर्वाद मांगा. इस प्रकार, नेताजी ने गांधीजी को सर्वप्रथम राष्ट्रपिता बुलाया.
द्वितीय विश्वयुद्ध में जापान की हार के बाद नेताजी को नया रास्ता ढूँढना जरूरी था. उन्होने रूस से सहायता माँगने का निश्चय किया था. 18 अगस्त, 1945 को नेताजी हवाई जहाज से मंचूरिया की तरफ जा रहे थे. इस सफर के दौरान वे लापता हो गए. इस दिन के बाद वे कभी किसी को दिखाई नहीं दिए. 23 अगस्त, 1945 को जापान की दोमेई खबर संस्था ने दुनिया को खबर दी कि 18 अगस्त के दिन नेताजी का हवाई जहाज ताइवान की भूमि पर दुर्घटनाग्रस्त हो गया था और उस दुर्घटना में बुरी तरह से घायल होकर नेताजी ने अस्पताल में अंतिम साँस ले ली थी.
फिर नेताजी की अस्थियाँ जापान की राजधानी तोकियो में रेनकोजी नामक बौद्ध मंदिर में रखी गयीं. स्वतंत्रता के पश्चात, भारत सरकार ने इस घटना की जाँच करने के लिए, 1956 और 1977 में दो बार आयोग गठित किया. दोनों बार यह नतीजा निकला कि नेताजी उस विमान दुर्घटना में ही मारे गए थे. मगर समय-समय पर उनकी मौत को लेकर बहुत सी आंशकाएं जताई जाती रही हैं. भारत के सबसे बड़े स्वतंत्रता सेनानी और इतने बड़े नायक की मृत्यु के बारे में आज तक रहस्य बना हुआ है जो देश की सरकार के लिए एक शर्म की बात है.
नेताजी ने उग्रधारा और क्रांतिकारी स्वभाव में लड़ते हुए देश को आजाद कराने का सपना देखा था. अगर उन्हें भारतीय नेताओं का भी भरपूर सहयोग मिला होता तो देश की तस्वीर यकीकन आज कुछ अलग होती. नेताजी सुभाष चन्द बोस को हमारी तरफ से भावभीनी श्रद्धांजलि.
शुरुआत में तो नेताजी की देशसेवा करने की बहुत मंशा थी पर अपने परिवार की वजह से उन्होंने विदेश जाना स्वीकार किया. पिता के आदेश का पालन करते हुए वे 15 सितम्बर 1919 को लंदन गए और वहां कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में अध्ययन करने लगे. वहां से उन्होंने आई.सी.एस. की परीक्षा उत्तीर्ण की और योग्यता सूची में चौथा स्थान प्राप्त किया. पर देश की सेवा करने का मन बना चुके नेताजी ने आई.सी.एस. से त्याग पत्र दे दिया.
भारत आकर वे देशबंधु चितरंजन दास के सम्पर्क में आए और उन्होंने उनको अपना गुरु मान लिया और कूद पड़े देश को आजाद कराने. चितरंजन दास के साथ उन्होंने कई अहम कार्य किए जिनकी चर्चा इतिहास का एक अहम हिस्सा बन चुकी है. स्वतंत्रता संग्राम के दौरान सुभाष चन्द्र बोस की सराहना हर तरफ हुई. देखते ही देखते वह एक महत्वपूर्ण युवा नेता बन गए. पंडित जवाहरलाल नेहरू के साथ सुभाषबाबू ने कांग्रेस के अंतर्गत युवकों की इंडिपेंडेंस लीग शुरू की.
लेकिन बोस के गर्म और तीखे तेवरों को कांग्रेस का नरम व्यवहार ज्यादा पसंद नहीं आया. उन्होंने 29 अप्रैल 1939 को कलकत्ता में हुई कांग्रेस की बैठक में अपना त्याग पत्र दे दिया और 3 मई 1939 को सुभाषचन्द्र बोस ने कलकत्ता में फॉरवर्ड ब्लाक अर्थात अग्रगामी दल की स्थापना की. सितम्बर 1939 में द्वितीय विश्व युद्व प्रांरभ हुआ. ब्रिटिश सरकार ने सुभाष के युद्ध विरोधी आन्दोलन से भयभीत होकर उन्हें गिरफ्तार कर लिया. सन् 1940 में सुभाष को अंग्रेज सरकार ने उनके घर पर ही नजरबंद कर रखा था. नेताजी अदम्य साहस और सूझबूझ का परिचय देते हुए सबको छकाते हुए घर से भाग निकले.
नेताजी ने एक मुसलमान मौलवी का वेष बनाकर पेशावर अफगानिस्तान होते हुए बर्लिग तक का सफर तय किया. बर्लिन में जर्मनी के तत्कालीन तानाशाह हिटलर से मुलाकात की और भारत को स्वतंत्र कराने के लिए जर्मनी व जापान से सहायता मांगी. जर्मनी में भारतीय स्वतंत्रता संगठन और आजाद हिंद रेडियो की स्थापना की. इसी दौरान सुभाषबाबू, नेताजी नाम से जाने जाने लगे. पर जर्मनी भारत से बहुत दूर था. इसलिए 3 जून 1943 को उन्होंने पनडुब्बी से जापान के लिए प्रस्थान किया. पूर्व एशिया और जापान पहुंच कर उन्होंने आजाद हिन्द फौज का विस्तार करना शुरु किया. पूर्व एशिया में नेताजी ने अनेक भाषण करके वहाँ स्थानीय भारतीय लोगों से आज़ाद हिन्द फौज में भरती होने का और आर्थिक मदद करने का आह्वान किया. उन्होंने अपने आह्वान में संदेश दिया “तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हे आजादी दूँगा.”
द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान आज़ाद हिन्द फौज ने जापानी सेना के सहयोग से भारत पर आक्रमण किया. अपनी फौज को प्रेरित करने के लिए नेताजी ने “दिल्ली चलो” का नारा दिया. दोनों फौजों ने अंग्रेजों से अंडमान और निकोबार द्वीप जीत लिए पर अंत में अंग्रेजों का पलड़ा भारी पड़ा और आजाद हिन्द फौज को पीछे हटना पड़ा.
6 जुलाई, 1944 को आजाद हिंद रेडियो पर अपने भाषण के माध्यम से गाँधीजी से बात करते हुए, नेताजी ने जापान से सहायता लेने का अपना कारण और आज़ाद हिन्द फौज की स्थापना के उद्देश्य के बारे में बताया. इस भाषण के दौरान, नेताजी ने गांधीजी को राष्ट्रपिता बुलाकर अपनी जंग के लिए उनका आशिर्वाद मांगा. इस प्रकार, नेताजी ने गांधीजी को सर्वप्रथम राष्ट्रपिता बुलाया.
द्वितीय विश्वयुद्ध में जापान की हार के बाद नेताजी को नया रास्ता ढूँढना जरूरी था. उन्होने रूस से सहायता माँगने का निश्चय किया था. 18 अगस्त, 1945 को नेताजी हवाई जहाज से मंचूरिया की तरफ जा रहे थे. इस सफर के दौरान वे लापता हो गए. इस दिन के बाद वे कभी किसी को दिखाई नहीं दिए. 23 अगस्त, 1945 को जापान की दोमेई खबर संस्था ने दुनिया को खबर दी कि 18 अगस्त के दिन नेताजी का हवाई जहाज ताइवान की भूमि पर दुर्घटनाग्रस्त हो गया था और उस दुर्घटना में बुरी तरह से घायल होकर नेताजी ने अस्पताल में अंतिम साँस ले ली थी.
फिर नेताजी की अस्थियाँ जापान की राजधानी तोकियो में रेनकोजी नामक बौद्ध मंदिर में रखी गयीं. स्वतंत्रता के पश्चात, भारत सरकार ने इस घटना की जाँच करने के लिए, 1956 और 1977 में दो बार आयोग गठित किया. दोनों बार यह नतीजा निकला कि नेताजी उस विमान दुर्घटना में ही मारे गए थे. मगर समय-समय पर उनकी मौत को लेकर बहुत सी आंशकाएं जताई जाती रही हैं. भारत के सबसे बड़े स्वतंत्रता सेनानी और इतने बड़े नायक की मृत्यु के बारे में आज तक रहस्य बना हुआ है जो देश की सरकार के लिए एक शर्म की बात है.
नेताजी ने उग्रधारा और क्रांतिकारी स्वभाव में लड़ते हुए देश को आजाद कराने का सपना देखा था. अगर उन्हें भारतीय नेताओं का भी भरपूर सहयोग मिला होता तो देश की तस्वीर यकीकन आज कुछ अलग होती. नेताजी सुभाष चन्द बोस को हमारी तरफ से भावभीनी श्रद्धांजलि.
भविष्य के नेता हैं विवेकानंद
भारतीय समाज, विशेषकर युवा पीढ़ी आज एक बहुत बड़े भटकाव और निराशा से गुजर रही है। एक ओर देश का अत्यंत समृद्ध तबका और धनी मध्यमवर्ग है जो अपनी लोक व क्षेत्रीय संस्कृति को भुलाकर, उपभोक्तावादी औपनिवेशिक संस्कृति के खुमार में डूबकर और समाज के सरोकारों से खुद को काटकर एक मूल्य विहीन जीवन शैली को अपनाने में गर्व महसूस करता है। दूसरी ओर एक बहुत बड़ा वंचितों का तबका है, जिसमें दलित, आदिवासी, महिलाएं, छोटे किसान और मजदूर आजादी के 65 वर्ष बाद भी जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं और न्यूनतम लोकतांत्रिक अधिकारों से भी वंचित है। स्वामी विवेकानंद ने ब्रिटिश साम्राज्यवाद के दौर में भारतीय युवाओं में मानवीय मूल्यों पर आधारित सामाजिक विकास और राष्ट्रवाद की भावना का संचार कर इस देश को जो दिशा दी थी, वह आज के समय में भी इस देश और युवाओं के लिए उतनी ही प्रासंगिक और जरूरी है।
भारतीय समाज में जातिवाद और पुरुष प्रधान सामंती सोच के कारण महिलाओं की गैर बराबरी और शोषण हमारे समय की सबसे बड़ी चुनौतियां है। इनका हल निकाले बिना मानवता के उत्थान अथवा धार्मिक-सामाजिक विकास के किसी सिद्धांत पर चर्चा करना बेमानी होगा। जाति व्यवस्था के बारे में स्वामी विवेकानंद का कहना था कि यह एक दोषपूर्ण व्यवस्था है। हमारे देश में अंधविश्वास और बुराइयां बहुत हैं। यह जाति व्यवस्था ही है जिसके कारण आज भी करोड़ों लोगों को भूखे पेट सोना पड़ता है। 'जन्म पर आधारित जाति व्यवस्था या नस्ल पर आधारित भेदभाव वास्तव में प्रकृति के श्रेष्ठतम बौद्धिक और मानसिक क्षमताओं के रूप में हमारे मनुष्य होने की पहचान पर एक बहुत बड़ा प्रश्नचिन्ह है। यह समाज एवं राष्ट्र के रूप में विभिन्न क्षेत्रों में प्रतिभा और क्षमता की तमाम उपलब्धियों के लिखे जा रहे सुनहरे अध्यायों के ऊपर लिपी हुई एक कालिख है, जिसे हम देखना नहीं चाहते।'
स्वामी विवेकानंद के शब्दों में 'इस देश में महिला व पुरुष के बीच इतना अंतर क्यों है, यह समझना बहुत मुश्किल है। वेदों का यह स्पष्ट ऐलान है कि सभी में एक ही और एक जैसी ही चेतना मौजूद है। आप हमेशा महिलाओं की आलोचना करते हैं पर आपने उनके उत्थान के लिए क्या किया है, सिवाय उन्हें कड़े नियमों में बांधने के? पुरुषों ने औरतों को बस बच्चा पैदा करने की मशीन में बदल दिया है। महिला को ऊपर उठाए बिना आपके खुद के आगे बढ़ने का और कोई रास्ता नहीं हो सकता।'
भारतीय समाज में स्त्री-पुरुष व के प्रेम व यौन संबंधों की प्रकृति एवं उसका आधार मुख्य रूप सेसामंती है। हम सभी इन संबंधों में विवाह संस्था की घटती जरूरत पर चिंता प्रकट करते है, परभारतीय समाज में परिवार व विवाह संस्था नारी गुलामी को सामाजिक स्वीकृति देने वालीव्यवस्था के रूप में ही मौजूद है, इस पर हम चुप हैं। सामंती संस्कृति और भूमंडलीकरण के बादउपजी औपनिवेशिक संस्कृति, दोनों में ही स्त्री की संपूर्ण ऊर्जा, विवेक, घरेलू व अन्य श्रम मेंउसके योगदान और उसकी आकाश छूती महत्वाकांक्षाओं और क्षमताओं को नजरअंदाज कर उसकेव्यक्तित्व को पुरुष द्वारा परिभाषित सौंदर्य मानकों तक सीमित कर दिया गया है। पर इस तथ्य सेभी इंकार नहीं किया जा सकता कि भूमंडलीकरण ने महिलाओं को घर की चारदीवारी में कैदरखने की दकियानूसी सोच के खिलाफ विद्रोह की ज़मीन भी तैयार की है। भारत को एकप्रगतिशील समाज बनाने के लिए इस विद्रोह को हमें एक सकारात्मक दिशा देनी होगी।
एक बार भयंकर अकाल पड़ा। स्वामी विवेकानंद का हृदय पीडि़तों की सेवा के लिए भावविभोर होउठा। वे दिन-रात सेवा कार्य के लिए तत्पर रहते। उन दिनों कोई भी साधु-संत या पंडित धर्म यादर्शन पर चर्चा के लिए आते तो सारी चर्चा को बंद करके वे अकाल पीडि़तों की सेवा को हीबातचीत का मुख्य मुद्दा बना देते थे। उसी समय पंजाब प्रांत से 'हितवादी' के संपादक पंडितसखाराम गणेश देऊस्कर अपने साथियों के साथ स्वामी जी से मिलने आए। बातचीत के दौरानउन्होंने पूरा समय इस पर केंद्रित कर दिया कि पंडित देऊस्कर के इलाके में अकाल पीडि़तों कोकैसे ज्यादा से ज्यादा भोजन उपलब्ध करवाया जाए। जाने से पहले पंडित सखाराम जी नेनाराजगी जताते हुए कहा कि हमें आपसे धर्म के ऊपर महत्वपूर्ण प्रवचनों और उपदेशों की उम्मीदथी पर हमारा समय व्यर्थ की बातों में बर्बाद हो गया। यह सुनकर स्वामी विवेकानंद काफी गंभीरहो गए और उन्होंने जवाब दिया- 'श्रीमान, जब तक मेरे देश का एक कुत्ता भी भूखा है, मेरापहला धर्म उसके लिए भोजन की व्यवस्था करना है।' उनका जवाब सुनकर तीनों आगंतुक स्तब्धरह गए। स्वामी जी की मृत्यु के बाद पंडित सखाराम ने उस घटना को याद करते हुए कहा था- 'उनके उन शब्दों ने मेरी सोच को हमेशा के लिए बदल के रख दिया और मुझे अहसास दिलायाकि सच्ची देशभक्ति क्या होती है।'
श्रम पर आधारित काम को हेय दृष्टि से देखने और बिना मेहनत के रातोंरात पूंजीपति बनने काजुगाड़ करने की एक और संस्कृति इधर देश में तेजी से फैल रही है और इसकी गिरफ्त में युवावर्ग सबसे ज्यादा है। मीडिया और मनोरंजन उद्योग से मेहनतकश आम आदमी, उसके मुद्दे औरपरिवेश आज पूरी तरह गायब हो चुका है। कुछ राजनीतिक हलकों द्वारा अपने स्वार्थ की पूर्ति केलिए सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का नारा उछाला जा रहा है, जिसका आधार सांप्रदायिक ध्रुवीकरण है।आर्थिक विषमता और जातिवाद का हल खोजे बिना जनता में प्रगतिशील राष्ट्रवाद की भावना कासंचार नहीं किया जा सकता। जब भी यह चुनौती हम अपने सामने रखेंगे, अपने संघर्ष का आदिप्रेरणास्रोत स्वामी विवेकानंद को ही पाएंगे।
भारतीय समाज में जातिवाद और पुरुष प्रधान सामंती सोच के कारण महिलाओं की गैर बराबरी और शोषण हमारे समय की सबसे बड़ी चुनौतियां है। इनका हल निकाले बिना मानवता के उत्थान अथवा धार्मिक-सामाजिक विकास के किसी सिद्धांत पर चर्चा करना बेमानी होगा। जाति व्यवस्था के बारे में स्वामी विवेकानंद का कहना था कि यह एक दोषपूर्ण व्यवस्था है। हमारे देश में अंधविश्वास और बुराइयां बहुत हैं। यह जाति व्यवस्था ही है जिसके कारण आज भी करोड़ों लोगों को भूखे पेट सोना पड़ता है। 'जन्म पर आधारित जाति व्यवस्था या नस्ल पर आधारित भेदभाव वास्तव में प्रकृति के श्रेष्ठतम बौद्धिक और मानसिक क्षमताओं के रूप में हमारे मनुष्य होने की पहचान पर एक बहुत बड़ा प्रश्नचिन्ह है। यह समाज एवं राष्ट्र के रूप में विभिन्न क्षेत्रों में प्रतिभा और क्षमता की तमाम उपलब्धियों के लिखे जा रहे सुनहरे अध्यायों के ऊपर लिपी हुई एक कालिख है, जिसे हम देखना नहीं चाहते।'
स्वामी विवेकानंद के शब्दों में 'इस देश में महिला व पुरुष के बीच इतना अंतर क्यों है, यह समझना बहुत मुश्किल है। वेदों का यह स्पष्ट ऐलान है कि सभी में एक ही और एक जैसी ही चेतना मौजूद है। आप हमेशा महिलाओं की आलोचना करते हैं पर आपने उनके उत्थान के लिए क्या किया है, सिवाय उन्हें कड़े नियमों में बांधने के? पुरुषों ने औरतों को बस बच्चा पैदा करने की मशीन में बदल दिया है। महिला को ऊपर उठाए बिना आपके खुद के आगे बढ़ने का और कोई रास्ता नहीं हो सकता।'
भारत में महिलाओं को शिक्षा का अधिकार दिलाने में स्वामी विवेकानंद का बहुत बड़ा योगदान है।जिस समय भारत में महिला शिक्षा को धर्माचार्यों द्वारा सम्मान की दृष्टि से नहीं देखा जाता था,उस समय उन्होंने इस विषय में कहा था- 'कौन से शास्त्र है जिनमें आपको लिखा मिलेगा किनारी ज्ञान एवं भक्ति के लायक नहीं है? पतन के दौर में जब धर्माचार्यों ने दूसरी जातियों को वेदपढ़ने के लिए अक्षम घोषित किया, तभी उन्होंने महिलाओं को भी उनके अधिकारों से वंचित करदिया। नहीं तो आप पाएंगे वैदिक और उपनिषद काल में मैत्रेयी एवं गार्गी जैसी स्त्रियों नेऋषि-मुनियों के बराबर स्थान प्राप्त किया था। एक हजार ब्राह्मणों की उपस्थिति में, जो वेदों के बड़ेविद्वान थे, गार्गी ने बड़े साहस से याज्ञवल्क्य को ब्रह्म ज्ञान के ऊपर शास्त्रार्थ की चुनौती दी थी।स्त्रियां यदि उस समय ज्ञान की अधिकारी थीं तो आज के समय में ये अधिकार उन्हें क्यों नमिलें?'
भारतीय समाज में स्त्री-पुरुष व के प्रेम व यौन संबंधों की प्रकृति एवं उसका आधार मुख्य रूप सेसामंती है। हम सभी इन संबंधों में विवाह संस्था की घटती जरूरत पर चिंता प्रकट करते है, परभारतीय समाज में परिवार व विवाह संस्था नारी गुलामी को सामाजिक स्वीकृति देने वालीव्यवस्था के रूप में ही मौजूद है, इस पर हम चुप हैं। सामंती संस्कृति और भूमंडलीकरण के बादउपजी औपनिवेशिक संस्कृति, दोनों में ही स्त्री की संपूर्ण ऊर्जा, विवेक, घरेलू व अन्य श्रम मेंउसके योगदान और उसकी आकाश छूती महत्वाकांक्षाओं और क्षमताओं को नजरअंदाज कर उसकेव्यक्तित्व को पुरुष द्वारा परिभाषित सौंदर्य मानकों तक सीमित कर दिया गया है। पर इस तथ्य सेभी इंकार नहीं किया जा सकता कि भूमंडलीकरण ने महिलाओं को घर की चारदीवारी में कैदरखने की दकियानूसी सोच के खिलाफ विद्रोह की ज़मीन भी तैयार की है। भारत को एकप्रगतिशील समाज बनाने के लिए इस विद्रोह को हमें एक सकारात्मक दिशा देनी होगी।
एक बार भयंकर अकाल पड़ा। स्वामी विवेकानंद का हृदय पीडि़तों की सेवा के लिए भावविभोर होउठा। वे दिन-रात सेवा कार्य के लिए तत्पर रहते। उन दिनों कोई भी साधु-संत या पंडित धर्म यादर्शन पर चर्चा के लिए आते तो सारी चर्चा को बंद करके वे अकाल पीडि़तों की सेवा को हीबातचीत का मुख्य मुद्दा बना देते थे। उसी समय पंजाब प्रांत से 'हितवादी' के संपादक पंडितसखाराम गणेश देऊस्कर अपने साथियों के साथ स्वामी जी से मिलने आए। बातचीत के दौरानउन्होंने पूरा समय इस पर केंद्रित कर दिया कि पंडित देऊस्कर के इलाके में अकाल पीडि़तों कोकैसे ज्यादा से ज्यादा भोजन उपलब्ध करवाया जाए। जाने से पहले पंडित सखाराम जी नेनाराजगी जताते हुए कहा कि हमें आपसे धर्म के ऊपर महत्वपूर्ण प्रवचनों और उपदेशों की उम्मीदथी पर हमारा समय व्यर्थ की बातों में बर्बाद हो गया। यह सुनकर स्वामी विवेकानंद काफी गंभीरहो गए और उन्होंने जवाब दिया- 'श्रीमान, जब तक मेरे देश का एक कुत्ता भी भूखा है, मेरापहला धर्म उसके लिए भोजन की व्यवस्था करना है।' उनका जवाब सुनकर तीनों आगंतुक स्तब्धरह गए। स्वामी जी की मृत्यु के बाद पंडित सखाराम ने उस घटना को याद करते हुए कहा था- 'उनके उन शब्दों ने मेरी सोच को हमेशा के लिए बदल के रख दिया और मुझे अहसास दिलायाकि सच्ची देशभक्ति क्या होती है।'
श्रम पर आधारित काम को हेय दृष्टि से देखने और बिना मेहनत के रातोंरात पूंजीपति बनने काजुगाड़ करने की एक और संस्कृति इधर देश में तेजी से फैल रही है और इसकी गिरफ्त में युवावर्ग सबसे ज्यादा है। मीडिया और मनोरंजन उद्योग से मेहनतकश आम आदमी, उसके मुद्दे औरपरिवेश आज पूरी तरह गायब हो चुका है। कुछ राजनीतिक हलकों द्वारा अपने स्वार्थ की पूर्ति केलिए सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का नारा उछाला जा रहा है, जिसका आधार सांप्रदायिक ध्रुवीकरण है।आर्थिक विषमता और जातिवाद का हल खोजे बिना जनता में प्रगतिशील राष्ट्रवाद की भावना कासंचार नहीं किया जा सकता। जब भी यह चुनौती हम अपने सामने रखेंगे, अपने संघर्ष का आदिप्रेरणास्रोत स्वामी विवेकानंद को ही पाएंगे।
Subscribe to:
Posts (Atom)
